आगरा ग्रामीण विधानसà¤à¤¾ सीट - Agra
आगरा ग्रामीण |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्रीमती बेबी रानी मौर्य |
| जिला | Agra |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | फतेहपुर सीकरी |
आगरा ग्रामीण विधानसभा सीट प्रोफाइल
आगरा ग्रामीण (आरक्षित) विधानसभा सीट आगरा शहर के चारों ओर फैले देहाती, अर्धशहरी इलाकों को समेटती है, जो पहले दयालबाग सीट के नाम से जानी जाती थी और 2008 के परिसीमन के बाद आगरा ग्रामीण बनी। यह सीट एससी आरक्षित है, फतेहपुर सीकरी लोकसभा के तहत आती है और बीएसपी के पुराने दबदबे के बाद 2017 से लगातार भाजपा के मजबूत किले के रूप में देखी जा रही है।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: आगरा
विधानसभा क्रमांक: 90
लोकसभा क्षेत्र: फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र।
आरक्षण: अनुसूचित जाति (एससी आरक्षित)।
अनुमानित आबादी: लगभग 3.5-4 लाख
साक्षरता दर: लगभग 65-70 प्रतिशत
लिंग अनुपात: लगभग 880-900 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष
धार्मिक और सामाजिक विभाजन
हिंदू: 82-85%
मुस्लिम: 10-13%
अन्य समुदाय: 2-3%
अनुसूचित जाति: 26-28%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
आगरा ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र पहले लोहामंडी सीट का हिस्सा था। 1974 में इसे अलग करके दयालबाग विधानसभा बनाया गया और 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम आगरा ग्रामीण हो गया। 2007 तक यह सामान्य सीट थी, लेकिन 2012 से इसे एससी के लिए आरक्षित कर दिया गया। 2012 में बसपा के कालीचरण सुमन ने करीब 69,969 वोट (लगभग 35% वोट शेयर) पाकर जीत हासिल की, जबकि सपा की हेमलता दूसरे नंबर पर रहीं। 2017 में भाजपा की हेमलता दिवाकर ने 1,29,887 वोट (करीब 52%) लेकर बसपा उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया, जिसे उस समय की भाजपा लहर और एससी–ओबीसी समीकरण का असर माना गया। 2022 में भाजपा की बेबी रानी मौर्य ने पहली बार यहां से चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड अंतर से जीतकर पार्टी की पकड़ और मजबूत कर दी। खास बात यह है कि इस सीट पर कांग्रेस कभी नहीं जीती; 1974 से यहां लगातार गैर–कांग्रेसी दल ही जीतते आए हैं।
2022 चुनावी परिणाम (आगरा ग्रामीण विधानसभा)
कुल मतदाता:
मतदान प्रतिशत:
विजेता: श्रीमती बेबी रानी मौर्य (भाजपा)
वोट शेयर: 52.63 प्रतिशत।
उपविजेता: किरण प्रभा केशरी, (बसपा)
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
बेबी रानी मौर्य दलित (जाटव) समुदाय से आने वाली भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं। वे 1995 में आगरा की मेयर रह चुकी हैं और 2018 से 2021 तक उत्तराखंड की राज्यपाल भी रहीं, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। 2021 में राज्यपाल पद छोड़ने के बाद वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुईं और 2022 में आगरा ग्रामीण से पहली बार विधायक चुनी गईं। उनकी छवि एक अनुभवी और मजबूत दलित–महिला नेता की रही है। उनके चुनावी हलफनामे या निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से उनके खिलाफ किसी बड़े या गंभीर आपराधिक मामले का जिक्र नहीं मिलता।
आगरा ग्रामीण विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
खैरागढ़ विधानसभा क्षेत्र में चुनावी बहस मुख्यतः ग्रामीण ढांचे, कृषि और सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दों के इर्द–गिर्द घूमती है। गांवों में सड़क, नाली–सीवर, पेयजल, बिजली आपूर्ति और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी पर जनता लगातार सवाल उठाती रही है, जबकि सत्ताधारी पक्ष प्रधान–ब्लॉक–विधायक समन्वय से विकास कार्यों का दावा करता है। गंगा–यमुना दोआब के निकट स्थित हिस्सों में सिंचाई, नहरों की सफाई, ट्यूबवेल कनेक्शन, खाद–बीज की कीमतें और शहरी विस्तार के कारण भूमि अधिग्रहण किसानों के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। एससी आरक्षित सीट होने के कारण जाटव और अन्य दलित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी योजनाओं की पहुंच तथा जमीनी विवादों में प्रशासनिक रवैये पर भी राजनीति केंद्रित रहती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे विद्यालयों में स्टाफ की कमी, उच्च शिक्षण संस्थानों की दूरी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर, दवा, आपात सेवाओं की कमी को लेकर असंतोष बना रहता है। आगरा शहर की नजदीकी के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र में सीमित रोजगार अवसरों के कारण युवाओं का पलायन जारी है, जिससे “शहर पास, सुविधाएं दूर” का मुद्दा स्थानीय राजनीति में बार–बार उठता है।