चकिया विधानसà¤à¤¾ सीट - Chandauli
चकिया |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री कैलाश |
| जिला | Chandauli |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | रॉबर्ट्सगंज |
चकिया विधानसभा सीट
चकिया एक नगर पंचायत है जो उत्तर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के वाराणसी मंडल के चंदौली जिले में स्थित है। चकिया एक तहसील भी है जिसका मुख्यालय चकिया नगर है। ब्रिटिश भारत में चकिया बनारस राज्य का हिस्सा था और मिर्जापुर जिले के तहसीलों में से एक था। चकिया के एक ओर विंध्य पठार तो दूसरी ओर गंगा के मैदानी इलाके हैं। तहसील का बड़ा हिस्सा विंध्य पठार में स्थित है। इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है, और मुख्य रूप से चावल और गेहूँ का उत्पादन होता है।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 383
ज़िला: चंदौली
लोकसभा क्षेत्र: रॉबर्ट्सगंज
आरक्षण स्थिति: अनुसूचित जाति
जनसंख्या विभाजन
चकिया नगर (नगर पंचायत), जनगणना 2011
जनसंख्या: 17,356
लिंग अनुपात: 913/1,000
साक्षरता दर: 75.9%
अनुसूचित जाति: 22.88% (ज़िला औसत)
धार्मिक और सामुदायिक विभाजन (2011 की जनगणना, ज़िला)
हिंदू: 88.48%
मुस्लिम: 11.01%
ईसाई: 0.11%
सिख: 0.07%
बौद्ध: 0.02%
जैन: 0.01%
अन्य: 0.25%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,44,283
विजेता: कैलाश खरवार (भाजपा)
वोट शेयर: 40.0%
उपविजेता: जितेन्द्र कुमार (सपा)
मतदान प्रतिशत: 65.6%
चकिया (चंदौली) विधानसभा सीट, जो 1962 से अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है, उत्तर प्रदेश की एक राजनीतिक रूप से विविध और प्रतिस्पर्धी सीट रही है। शुरुआती वर्षों में कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के बीच मुकाबला होता रहा, जहां 1967 में सोशलिस्ट पार्टी ने बढ़त बनाई, लेकिन 1969 में कांग्रेस ने वापसी की। 1977 में जनता पार्टी के श्यामदेव विजयी हुए, जबकि 1980 और 1985 में कांग्रेस के खरपत राम और 1989 में जनता दल के सत्य प्रकाश सोनकर ने जीत दर्ज की। 1990 के दशक से यह सीट बहुकोणीय मुकाबलों का केंद्र बन गई, जहां 1996 में सपा, 2002 में भाजपा, 2007 में बसपा, 2012 में फिर सपा और 2017 व 2022 में भाजपा विजयी रही। खास बात यह रही कि कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा चारों दलों को यहां जीत मिल चुकी है, जिससे यह सीट अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बनी हुई है। हाल के चुनावों में भाजपा का वर्चस्व दिखाई देता है, हालांकि 2022 में मुकाबला कड़े होने के कारण कैलाश खरवार की जीत का अंतर घटकर 9,251 वोट रह गया, जो का संकेत है। जातिगत रूप से यह सीट अनुसूचित जाति मतदाताओं पर निर्भर रही है, जिन्हें लुभाने के लिए सभी प्रमुख दलों ने रणनीतियाँ बनाई हैं। स्थानीय मुद्दों में सड़क, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, नक्सल समस्या और रोजगार जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरे हैं, जो चुनावी राजनीति को लगातार प्रभावित करते रहे हैं।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
कैलाश खरवार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और वर्तमान में चकिया (चंदौली) सुरक्षित (SC) विधानसभा सीट से विधायक हैं, एक शिक्षक से जनसेवक बनने तक का प्रेरणादायक सफर तय कर चुके हैं। उनका जन्म साराडीह गांव, चकिया विकासखंड में हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्राथमिक विद्यालय चकिया द्वितीय में प्रधानाध्यापक के रूप में की और सरस्वती शिशु मंदिर में भी अध्यापन कार्य किया। मात्र 15 वर्ष की उम्र में ही वे संघ और जनसंघ से जुड़ गए थे और वर्षों तक सामाजिक व संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रहे। 2022 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेकर भाजपा से चुनाव लड़ा और सपा के जितेंद्र कुमार को 9,251 वोटों के अंतर से हराकर विधायक बने। एक साधारण, सादगीपूर्ण और सेवा-भावना से ओतप्रोत व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाने वाले कैलाश खरवार जनता से सीधे जुड़े रहते हैं और ईमानदारी के प्रतीक माने जाते हैं। 2022 के चुनावी हलफनामे के अनुसार उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
चकिया विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में चकिया विधानसभा क्षेत्र में रोजगार, आधारभूत सुविधाओं और जनसेवाओं से जुड़ी कई गंभीर समस्याएँ चुनावी बहस के केंद्र में रही हैं। क्षेत्र में स्थानीय रोजगार के अभाव के कारण युवाओं और मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा है, जबकि कृषि और सरकारी नौकरियों के अलावा वैकल्पिक आजीविका के साधनों की कमी ने बेरोजगारी को और गंभीर बना दिया है। सिंचाई और पेयजल संकट भी बड़ी चुनौती रही, खासकर ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में नहरों की सफाई, तालाबों के पुनरुद्धार और गर्मियों में जल उपलब्धता की समस्या ने किसानों की चिंता बढ़ाई है। वहीं, जर्जर सड़कों, सीवर और जल निकासी की दयनीय स्थिति ने आवागमन और स्वच्छता को प्रभावित किया है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में गंदगी, कूड़ा प्रबंधन और सीवर जाम की समस्या आम रही है, जिससे जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रही. सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, संसाधनों का अभाव और अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता जैसी समस्याओं के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की माँग बार-बार उठती रही है।