छाता विधानसà¤à¤¾ सीट - Mathura
छाता |
|
|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री लक्ष्मी नारायण |
| जिला | Mathura |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | मथुरा |
छाता विधानसभा सीट
छाता विधानसभा उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की एक प्रमुख विधान सभा सीट है। यह मथुरा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और इसका विधानसभा क्रमांक 81 है। सीट का गठन 1952 में हुआ था और यह क्षेत्र बहुसंख्यक ग्रामीण एवं कृषि प्रधान माना जाता है। छाता विधानसभा के अंतर्गत कोसीकलां, नंदगांव, छाता नगर पंचायत और कई गाँव व कस्बे आते हैं।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: मथुरा
विधानसभा क्रमांक: 81
लोकसभा क्षेत्र: मथुरा
आरक्षण: कोई नहीं (सामान्य सीट)
अनुमानित आबादी: लगभग 3,50,000
साक्षरता दर: लगभग 68%
लिंग अनुपात: 863/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन (अनुमानित/जिला औसत)
हिंदू: लगभग 89%
मुस्लिम: लगभग 10%
अन्य समुदाय: 1% से कम
अनुसूचित जाति: 20%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,37,442
विजेता: चौधरी लक्ष्मी नारायण (भाजपा)
वोट शेयर: 52.4%
उपविजेता: तेजपाल सिंह (रालोद)
मतदान प्रतिशत: 65.34%
छाता विधानसभा, जो मथुरा जिले की एक अहम सीट है, उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका के कारण चर्चा में रही है। इस क्षेत्र में खासतौर पर जाट और ठाकुर मतदाता चुनावी परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 1951-52 में गठित इस सीट पर दशकों तक चौधरी लक्ष्मी नारायण और ठाकुर तेजपाल सिंह जैसे नेताओं का दबदबा रहा है, जो विभिन्न दलों से चुनाव लड़ते हुए कई बार जीत दर्ज कर चुके हैं। समाजवादी पार्टी यहां कभी प्रभावी नहीं रही, जबकि भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व और जातीय समर्थन के सहारे अपनी स्थिति मजबूत की है। 2022 के चुनावों में कुल 3.4 लाख मतदाताओं में से करीब 65% ने मतदान किया, जिसमें भाजपा के चौधरी लक्ष्मी नारायण ने 52.18% वोटों के साथ लगभग 49 हजार वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। उनके मुकाबले रालोद समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार तेजपाल सिंह दूसरे और बसपा के मनोज पाठक तीसरे स्थान पर रहे। छाता विधानसभा की राजनीति परिवारवाद, जातीय आधार और स्थानीय नेताओं की पकड़ के इर्द-गिर्द घूमती रही है, और 2022 का चुनाव इस बात का संकेत है कि भाजपा फिलहाल यहां एक मजबूत स्थिति में है। ग्रामीण अवसंरचना, कृषि, रोजगार और जातीय संतुलन जैसे मुद्दे यहां के चुनावों में आज भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
चौधरी लक्ष्मी नारायण उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की छाता विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर कार्यरत हैं। उनका जन्म 22 जुलाई 1951 को मथुरा के संचुली गांव में हुआ था। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. और एल.एल.बी. की पढ़ाई की है और पेशे से कृषि से जुड़े हुए हैं। उनका राजनीतिक सफर 1985 में लोकदल से शुरू हुआ, जब उन्होंने पहली बार विधायक के रूप में जीत दर्ज की। इसके बाद वे कांग्रेस, बसपा और अब भाजपा में सक्रिय रह चुके हैं। बसपा के साथ रहते हुए मायावती सरकार में कृषि मंत्री भी रहे। 2015 में उन्होंने बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थामा और 2017 में छाता से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर मंत्री बने। वर्तमान में वे दुग्ध विकास, पशुधन और मत्स्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और उनके नेतृत्व में इन क्षेत्रों में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। वे न सिर्फ मथुरा बल्कि कौशांबी जिले के भी पार्टी प्रभारी रह चुके हैं। छाता से वे अब तक 4-5 बार विधायक चुने जा चुके हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय के एक प्रभावशाली और अनुभवी नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। 2022 चुनावी हलफनामे के अनुसार उनके खिलाफ कोई सार्वजनिक आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, जिससे वे एक साफ-सुथरी छवि वाले नेता माने जाते हैं।
छाता विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में छाता विधानसभा क्षेत्र ने कई अहम समस्याओं का सामना किया है। बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो सड़कों की जर्जर हालत, पानी की किल्लत और बिजली की अनियमित आपूर्ति खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में लोगों की जिंदगी को कठिन बना रही है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रही हैं। सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाल स्थिति लगातार चिंता का विषय बनी रही। वहीं, युवाओं के लिए रोजगार के सीमित अवसर और स्वरोजगार को लेकर सरकार की उदासीनता ने बेरोजगारी की समस्या को और गहरा किया है। खेती इस क्षेत्र की रीढ़ है, लेकिन सिंचाई के संसाधनों की कमी, बाजारों में उचित मूल्य न मिलना और कृषि कार्यों के लिए जरूरी सहायता का अभाव किसानों को परेशान करता रहा। राजनीतिक रूप से यह इलाका जाट, ठाकुर, ब्राह्मण, जाटव, मुस्लिम, बघेल और गुर्जर जैसे विभिन्न जातीय समुदायों के चलते बेहद संवेदनशील रहा है, जो हर चुनाव में बड़ी भूमिका निभाते हैं। विकास योजनाओं का धीमा क्रियान्वयन और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता में निराशा पैदा की है। इसके अलावा, धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण होने के बावजूद पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन के क्षेत्र में छाता को वह ध्यान नहीं मिला जिसकी वह हकदार है। इन सभी पहलुओं ने मिलकर क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक दिशा को गहराई से प्रभावित किया है, और यही मुद्दे आगामी चुनावों में भी निर्णायक साबित हो सकते हैं।