चिल्लूपार विधानसभा सीट - Gorakhpur

चिल्लूपार

वर्तमान विधायक
श्री राजेश त्रिपाठी
जिला
Gorakhpur
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
बांसगांव
चिल्लूपार विधानसभा सीट
चिल्लूपार विधानसभा सीट (संख्या 328) उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित है और बांसगांव लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। यह क्षेत्र मुख्यतः ग्रामीण और कस्बाई मिश्रित स्वरूप का है, जिसमें कृषि, छोटे व्यवसाय और श्रमिक वर्ग की बड़ी भागीदारी है। चिल्लूपार सीट का राजनीतिक इतिहास विविध रहा है, यहां कई बार निर्दलीय और क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवार भी जीतते रहे हैं।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: गोरखपुर
विधानसभा क्रमांक: 328
लोकसभा क्षेत्र: बांसगांव
अनुमानित आबादी: 3.5-4.3 लाख
आरक्षण: सामान्य
लिंगानुपात: 950/1,000
साक्षरता दर: 65-70%
धार्मिक और सामाजिक विभाजन
हिंदू: 85%
मुस्लिम: 10-12%
अन्य समुदाय: 1% से कम
अनुसूचित जाति: 18-22%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,25,831
विजेता: राजेश त्रिपाठी (भाजपा)
वोट शेयर: 42.9%
उपविजेता: विनय शंकर तिवारी (सपा)
मतदान प्रतिशत: 52.8%
चिल्लूपार विधानसभा सीट गोरखपुर जिले की एक अहम सीट रही है, जो लंबे समय तक ब्राह्मण नेतृत्व और बाहुबली राजनीति के लिए जानी जाती रही है। 1985 में हरिशंकर तिवारी ने जेल से निर्दलीय चुनाव जीतकर यहां की राजनीति में अपराध और सत्ता के गठजोड़ की शुरुआत की थी। इसके बाद वे 2007 तक अलग-अलग पार्टियों से लगातार छह बार विधायक रहे। फिर 2007 और 2012 में बसपा के राजेश त्रिपाठी ने तिवारी परिवार को हराकर सीट अपने नाम की। 2017 में हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी ने बसपा से जीत दर्ज की। दिलचस्प बात यह रही कि 1985 से 2022 तक इस सीट पर हमेशा ब्राह्मण उम्मीदवार ही जीतते रहे। 2022 में पहली बार भाजपा को इस सीट पर जीत मिली, जब राजेश त्रिपाठी ने समाजवादी पार्टी के विनय तिवारी को 21,645 वोटों से हराया। इस बार बसपा ने ब्राह्मण की जगह क्षत्रिय उम्मीदवार उतारा, जिससे ब्राह्मण वोट बिखर गए और भाजपा को फायदा मिला। चुनाव में जातीय समीकरणों के साथ-साथ विकास, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी अहम रहे।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
राजेश त्रिपाठी गोरखपुर जिले की चिल्लूपार विधानसभा सीट से विधायक हैं और फिलहाल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े हैं। उन्होंने 1985 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और पहले पत्रकारिता और फिर सामाजिक सेवा के रास्ते राजनीति में आए। सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहने के कारण लोग उन्हें 'मुक्तिपथ वाले बाबा' या 'श्मशान घाट वाले बाबा' के नाम से भी जानते हैं। उनका राजनीतिक सफर 2007 में शुरू हुआ जब उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर हरिशंकर तिवारी जैसे कद्दावर नेता को हराया। 2012 में भी उन्होंने तिवारी को हराकर जीत दोहराई। 2022 में वे भाजपा प्रत्याशी के रूप में फिर से जीतकर विधानसभा पहुंचे। जहां तक आपराधिक रिकॉर्ड की बात है, 2022 चुनावी परिणाम के अनुसार उनके खिलाफ तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं।
चिल्लूपार विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में राजनीति का केंद्र बिंदु जातीय समीकरण और राजनीतिक वर्चस्व रहा है। यहां लंबे समय तक बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी और उनके परिवार का खासा प्रभाव रहा, जिनकी राजनीति ब्राह्मण अस्मिता और अपराध से जुड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही। 2022 के चुनाव में भी 'ब्राह्मण स्वाभिमान' बनाम 'विकास' की बहस ज़ोरों पर रही। एक ओर भाजपा ने सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विकास के मुद्दों को उठाया, तो वहीं समाजवादी पार्टी और अन्य दलों ने जातीय पहचान को आगे रखा। इसके साथ ही, अपराध और राजनीति के गठजोड़ के कारण कानून-व्यवस्था भी बड़ा सवाल बना रहा। दल-बदल की घटनाओं जैसे बसपा से जीते विनय शंकर तिवारी के सपा में जाने ने भी स्थानीय राजनीति में अस्थिरता पैदा की। वहीं, आम लोगों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर उम्मीदें बनी रहीं, लेकिन जातीय राजनीति के आगे ये अक्सर दब जाती हैं। प्रशासनिक सुधार और शहरीकरण भी चर्चा में रहे, खासकर स्थानीय निकायों की भूमिका को लेकर। कुल मिलाकर, चिल्लूपार की राजनीति विकास और पहचान की खींचतान में उलझी रही।

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