डिबाई विधानसभा सीट - Bulandshahr

डिबाई

वर्तमान विधायक
श्री चन्द्रपाल सिंह
जिला
Bulandshahr
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
बुलंदशहर
डिबाई विधानसभा सीट
डिबाई विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश विधान सभा के 403 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। यह बुलंदशहर जिले में स्थित है और बुलंदशहर लोकसभा क्षेत्र की पाँच विधानसभा सीटों में शामिल है। इस क्षेत्र में पहला चुनाव 1957 में संपन्न हुआ, जब 1956 में 'डीपीएसीओ (1956)' यानी परिसीमन आदेश लागू किया गया था। वर्ष 2008 में 'संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदेश' लागू होने के बाद इस सीट को 68वीं विधानसभा सीट के रूप में मान्यता दी गई।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 68
जिला: बुलंदशहर
लोकसभा क्षेत्र: बुलंदशहर
आरक्षण स्थिति: कोई नहीं
तहसील जनसंख्या (2011): 4,33,395
लिंगानुपात: 898/1000
साक्षरता दर: 60.13%
धार्मिक और जातीय विभाजन (तहसील, जनगणना 2011)
मुस्लिम: 9.68%%
हिन्दू: 90.08%
ईसाई: 0.06%
सिख: 0.07%
अनुसूचित जाति: 13.82%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,18,301
विजेता: चंद्रपाल सिंह (भाजपा)
वोट शेयर: 58.9%
उपविजेता: हरीश कुमार (सपा)
मतदान प्रतिशत: 62.9%
देबाई विधानसभा सीट की स्थापना 1957 में हुई थी और यह बुलंदशहर लोकसभा क्षेत्र की प्रमुख विधानसभा सीटों में से एक है। 2008 के परिसीमन के बाद इसे विधानसभा क्षेत्र संख्या 68 के रूप में अधिसूचित किया गया। प्रारंभिक वर्षों में, 1957 से 1974 तक यहां भारतीय जनसंघ का प्रभाव रहा, जबकि 1977 में जनता पार्टी, 1980 और 1985 में कांग्रेस, और 1989 में जनता दल ने जीत दर्ज की। 1991 से 1997 तक भाजपा का दबदबा बना रहा, इसके बाद 2002 में राष्ट्रीय क्रांति पार्टी, 2007 में बसपा और 2012 में सपा के भगवान शर्मा ने जीत हासिल की। 2017 से यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में है, जब डॉ. अनीता सिंह राजपूत ने जीत दर्ज की, और 2022 में चंद्रपाल सिंह ने इस वर्चस्व को कायम रखा। हाल के चुनावी रुझानों में भाजपा ने 2022 में 58.6% वोट शेयर के भारी अंतर से जीत दर्ज की, जबकि सपा को 27.6% और बसपा को 11.1% वोट मिले। 2017 में भी भाजपा ने 53.29% वोटों के साथ जीत हासिल की थी। इसके मुकाबले 2012 में सपा ने 34.37% वोट पाकर जीत दर्ज की थी, लेकिन उस चुनाव में मुकाबला काफी करीबी रहा था। कुल मिलाकर, 2017 से भाजपा का इस क्षेत्र में वर्चस्व लगातार मजबूत हुआ है, वहीं सपा और बसपा क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर खिसकती गई हैं। जातीय और धार्मिक समीकरणों, ग्रामीण-शहरी जनसंख्या के संतुलन, और स्थानीय विकास से जुड़े मुद्दों ने यहां के चुनावी रुझानों को गहराई से प्रभावित किया है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
चंद्रपाल सिंह लोधी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक हैं, जो उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की देबाई विधानसभा सीट से 2022 में पहली बार निर्वाचित हुए। इनका जन्म डिबाई तहसील के बदरपुर गाँव में हुआ था और 2022 के अनुसार इनकी उम्र 58 वर्ष है। मैट्रिक तक शिक्षित चंद्रपाल सिंह का पेशा कृषि, दुग्ध व्यवसाय और छोटे उद्योगों से जुड़ा रहा है। इन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में स्थानीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और राजनीति में प्रवेश वरिष्ठ नेताओं जैसे बाबूजी कल्याण सिंह और राजू भैया के मार्गदर्शन में किया। विधायक बनने के पहले ही ये किसान और ग्रामीण समाज के बीच अपनी जनसेवा और किसान हितैषी छवि के कारण लोकप्रिय थे। डेयरी और कृषि विकास के लिए क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाले चंद्रपाल सिंह ने 2022 के चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशी को 68,025 मतों के रिकॉर्ड अंतर से पराजित किया। चुनावी हलफनामे और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
देबाई विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में देबाई विधानसभा क्षेत्र में कई अहम स्थानीय मुद्दे लगातार चर्चा में रहे। बुनियादी विकास और ग्रामीण अवसंरचना की दृष्टि से क्षेत्र में जर्जर सड़कों, जल निकासी की खराब व्यवस्था, ग्रामीण संपर्क मार्गों की कमी और पेयजल संकट जैसी समस्याएँ प्रमुख रहीं। कृषि प्रधान इस क्षेत्र में किसानों को सिंचाई सुविधा, खाद-बीज की उपलब्धता, फसल का उचित मूल्य और समय पर भुगतान की मांगों को लेकर चिंता जताई गई, खासकर गन्ना, गेहूं और धान के उत्पादकों द्वारा। बेरोजगारी भी एक बड़ा मुद्दा बना रहा, जहाँ युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के लिए संसाधनों की कमी तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उचित सुविधाएँ नहीं मिल सकीं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों व अस्पतालों की बदहाल स्थिति, शिक्षकों व डॉक्टरों की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच के कारण जन असंतोष बढ़ा। इसके अलावा, लोधी, ठाकुर, वैश्य, दलित और मुस्लिम समुदायों की महत्वपूर्ण भागीदारी के कारण सामाजिक-जातीय समीकरण, प्रतिनिधित्व और सांप्रदायिक सौहार्द भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बने रहे। वहीं, कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई, जिसमें बढ़ते अपराध, भूमि विवाद और पुलिस की निष्क्रियता जैसे मुद्दे स्थानीय स्तर पर प्रभावी रहे।

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