देवरिया विधानसभा सीट - Deoria

देवरिया

वर्तमान विधायक
डा0 शलभ मणि त्रिपाठी
जिला
Deoria
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
देवरिया
देवरिया विधानसभा (उत्तर प्रदेश)
देवरिया उत्तर प्रदेश विधान सभा का एक निर्वाचन क्षेत्र है जो उत्तर प्रदेश राज्य के देवरिया जिले के देवरिया शहर को कवर करता है। देवरिया, देवरिया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। 2008 से, यह विधानसभा क्षेत्र 403 निर्वाचन क्षेत्रों में से 337 नंबर पर है। इस सीट को 1952 से 1967 तक देवरिया उत्तर विधानसभा के नाम से जाना जाता था। 1967 में इस सीट का नाम बदलकर देवरिया कर दिया गया। गोरखपुर से सटे हुए होने की वजह से देवरिया में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का काफी प्रभाव माना जाता है।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 337
जनपद: देवरिया
लोकसभा क्षेत्र: देवरिया
देवरिया जिला (जनगणना 2011)
कुल जनसंख्या: 31,00,946
देवरिया नगर (नगर पालिका, 2011)
कुल जनसंख्या: 1,29,479
पुरुष: 67,462
महिला: 62,017
लिंग अनुपात: 919/1000
साक्षरता दर: 86.8%
धार्मिक और जातीय विभाजन (जनगणना 2011)
हिन्दू: 87.77%
मुस्लिम: 1.66%
ईसाई: 0.14%
सिख: 0.2%
बौद्ध: 0.08%
जैन: 0.02%
अनुसूचित जाति: लगभग 15.7%
जनजाति जनसंख्या: 0.3%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 1,98,067
विजेता: शलभ मणि त्रिपाठी (भाजपा)
वोट शेयर: 53.9%
उपविजेता: पिंटू सैंथवार (सपा)
मतदान प्रतिशत: 56.2%
देवरिया विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास विविध और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 1952 में सीट के गठन के बाद पहले चुनाव में रामनाथ तिवारी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए, जिन्हें बाद में कांग्रेस का समर्थन प्राप्त हुआ। 1970 और 1980 के दशक में कांग्रेस और जनता पार्टी के बीच मुकाबला रहा, जिसमें 1980 और 1985 में कांग्रेस ने सीट पर कब्जा जमाया और फैजल मसूद (कांग्रेस) 1985 में विधायक बने। जनता दल और जेडी के प्रभाव के चलते 1977, 1980, 1989 और 1996 में इन दलों के उम्मीदवार विजयी रहे, जिनमें 1996 में सुभाष चंद्र श्रीवास्तव (जेडी) ने जीत हासिल की। 1991 से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उदय हुआ और रविंद्र प्रताप मल्ल ने 1991 और 1993 में लगातार जीत दर्ज की। इसके बाद भाजपा ने 2012, 2017, 2020 (उपचुनाव) और 2022 में लगातार विजय हासिल करते हुए अपना वर्चस्व स्थापित किया। समाजवादी पार्टी ने केवल 2007 में दीनानाथ कुशवाहा के माध्यम से जीत दर्ज की, जबकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अब तक सीट जीतने में असफल रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के शलभ मणि त्रिपाठी ने 53.52% वोट प्राप्त कर सपा के पिंटू सैंथवार को हराया। इस चुनाव में मतदाताओं ने उम्मीदवार के व्यक्तित्व और उनके विकास कार्यों को प्रमुखता दी। क्षेत्रीय मुद्दों में गन्ना किसानों की समस्याएं, चीनी मिलों की स्थिति, सड़क और सिंचाई व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और बेरोजगारी जैसे विषय लगातार केंद्र में रहे हैं।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
शलभ मणि त्रिपाठी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उभरते हुए नेता और वर्तमान में देवरिया सदर विधानसभा सीट से विधायक हैं। उनका जन्म 1 दिसंबर 1977 को देवरिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। गणित में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया और दैनिक जागरण, अमर उजाला तथा न्यूज18 जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्य किया। राजनीतिक विश्लेषण और टीवी डिबेट्स के लिए वे खासे चर्चित रहे। 2016 में उन्होंने भाजपा का दामन थामा और 2022 में पहली बार चुनाव लड़ते हुए सपा के अजय प्रताप सिंह को हराकर देवरिया सदर से विधायक निर्वाचित हुए। ब्राह्मण समुदाय में उनकी लोकप्रियता उल्लेखनीय है और वे भाजपा के प्रमुख युवा चेहरों में गिने जाते हैं। चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
देवरिया विधानसभा (उत्तर प्रदेश): पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में देवरिया विधानसभा (उत्तर प्रदेश) क्षेत्र में कई अहम मुद्दे लगातार चुनावी बहस का हिस्सा बने रहे। क्षेत्र में सड़क, बिजली, जल निकासी, पेयजल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग बनी रही, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में आधारभूत ढांचे की स्थिति पर सवाल उठते रहे। बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या रही, जहां स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों की कमी के चलते युवाओं का महानगरों की ओर पलायन जारी रहा और स्वरोजगार, सरकारी नौकरियों व छोटे उद्योगों की स्थापना की मांग तेज हुई। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी समस्याएं बनी रहीं, जैसे सरकारी स्कूलों में संसाधनों और योग्य शिक्षकों की कमी, उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव, और सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों व दवाओं की कमी। जातीय समीकरणों की दृष्टि से देवरिया सीट ब्राह्मण बहुल मानी जाती है और इसी कारण सभी प्रमुख दलों भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिससे जातिगत समीकरण चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। साथ ही, चुनाव के दौरान निष्पक्षता, बूथों पर दबाव, ईवीएम की खराबी और मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर उठी शिकायतों ने प्रशासनिक निष्पक्षता को भी एक प्रमुख मुद्दा बनाया।

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