जसराना विधानसà¤à¤¾ सीट - Firozabad
जसराना |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | इंजी0 सचिन यादव उर्फ जखई |
| जिला | Firozabad |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | फिरोजाबाद |
जसराना विधानसभा सीट
जसराना विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में स्थित है और यह फिरोजाबाद लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। यह सीट 1952 से अस्तित्व में है और इसका विधानसभा क्रमांक 96 है। जसराना तहसील इस सीट के अंतर्गत आती है। यहां का राजनीतिक इतिहास काफी विविध रहा है, जिसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), भाजपा और अन्य दलों के बीच मुकाबला देखने को मिलता है।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: फिरोजाबाद
विधानसभा क्रमांक: 96
कुल जनसंख्या: लगभग 24 लाख (जिला)
कुल जनसंख्या: 10,648 (नगर पंचायत)
साक्षरता दर: 67.68% (जिला)
लिंगानुपात: 902/1000
धार्मिक एवं सामाजिक विभाजन (जनगणना 2011)
हिन्दू: 80.34%
मुस्लिम: 18.16%
जैन: 1.25%
अन्य: 1% से कम
अनुसूचित जाति: 12.04%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,46,182
विजेता: सचिन यादव (सपा)
वोट शेयर: 44.0%
उपविजेता: मनवेन्द्र सिंह लोधी (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 67.4%
जसराना विधानसभा सीट, जो फिरोजाबाद जिले की एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सीट है, लंबे समय तक समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस का गढ़ रही है। कांग्रेस ने यहां पांच बार जीत हासिल की है, जबकि सपा ने भी कई चुनावों में कब्जा जमाया है, खासकर 1990 के दशक से यादव, पाल, बघेल और अन्य ओबीसी जातियों की अधिकता के कारण सपा का वर्चस्व बढ़ा। 2017 में पहली बार भाजपा के राम गोपाल उर्फ पप्पू लोधी ने सपा के वरिष्ठ नेता रामवीर सिंह को हराकर इस सीट पर कब्जा किया, जबकि उससे पहले 2012, 2002, 1996 और 1993 में रामवीर सिंह (सपा) विजेता रहे। इसके अलावा, 2007 में निर्दलीय राम प्रकाश यादव, 1991 में जेडी के जयदन सिंह, 1989 में कांग्रेस के रघुनाथ सिंह वर्मा पटेल, 1985 में एलकेडी के बलवीर सिंह, 1980 में इंक (आई) के विष्णु दयाल वर्मा और 1977 में जेएनपी के बलबीर सिंह ने जीत दर्ज की। हालिया चुनावी रुझानों में, 2017 में भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की थी, लेकिन 2022 में सपा ने मजबूत वापसी करते हुए यादव, पाल, बघेल, लोधी, जाटव (SC) और मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से पुनः इस सीट पर कब्जा किया। यहां किसान, बेरोजगारी, सड़क, सिंचाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे चुनावी बहस का केंद्र रहे हैं, जबकि जातीय समीकरण और किसान हित की राजनीति ने चुनाव के नतीजों को काफी प्रभावित किया। 2022 के चुनाव में सपा के सचिन यादव ने भाजपा के मानवेंद्र सिंह लोधी को मात्र 836 वोटों के संकीर्ण अंतर से हराया, जहां कुल मतदाता लगभग 3.63 लाख थे।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
सचिन यादव समाजवादी पार्टी (सपा) के युवा और प्रभावशाली नेता हैं, जो फिरोजाबाद जिले की जसराना विधानसभा सीट से वर्तमान विधायक हैं। उनका जन्म 1984 में हुआ और वे एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं, उनके पिता वीरपाल सिंह यादव एक जाने-माने समाजसेवी हैं। सचिन ने डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से एम.ए. (शिक्षा) की डिग्री हासिल की है और उन्हें एक शिक्षित, दूरदर्शी और जनता से जुड़े नेता के रूप में माना जाता है। उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा की ओर से भाग लेकर भाजपा के मानवेंद्र सिंह लोधी को मात्र 836 वोटों के बेहद कम अंतर से हराकर पहली बार विधायक का पद संभाला। सचिन यादव बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विशेष रूप से सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर भी उनकी अच्छी उपस्थिति है। चुनाव के दौरान दाखिल किए गए शपथपत्र के अनुसार, उनके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक मामला नहीं है, और उनकी छवि सार्वजनिक जीवन में साफ-सुथरी, सेवा-परक और सामाजिक कार्यों से जुड़ी रही है।
जसराना विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में जसराना विधानसभा क्षेत्र में किसानों की समस्याएं और कृषि विकास सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं, जहाँ गेहूं और आलू की खेती प्रमुख है। किसानों को उचित मूल्य, सिंचाई सुविधाएं, खाद-बीज की उपलब्धता और कृषि ऋण माफी जैसे विषय चुनावी बहस का केंद्र बने रहे। रोजगार की कमी के कारण युवाओं का पलायन भी जारी रहा, जिससे स्वरोजगार, सरकारी नौकरियों और स्थानीय उद्योगों की स्थापना की मांग बढ़ी। क्षेत्र में सड़क, जल निकासी, स्वच्छता, पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी विकास योजनाओं का अभाव भी जनता की चिंता बना हुआ है। खासकर जसराना और पूरे फिरोजाबाद जिले में खराब सड़कें, जलभराव और गंदगी की समस्याओं ने जनजीवन को प्रभावित किया, जो चुनावी वादों में बार-बार उठाए गए। इसके साथ ही, पाल, बघेल, यादव, अन्य ओबीसी और दलित समुदायों की संख्या अधिक होने के कारण जातीय समीकरण, प्रतिनिधित्व, आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे भी स्थानीय चुनावी चर्चा का हिस्सा रहे हैं।