करहल विधानसà¤à¤¾ सीट - Mainpuri
करहल |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री तेज प्रताप सिंह |
| जिला | Mainpuri |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | मैनपुरी |
करहल विधानसभा सीट
करहल विधानसभा उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र है, जो मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह सीट समाजवादी पार्टी (सपा) के गढ़ के रूप में जानी जाती है और यादव समुदाय का यहाँ महत्वपूर्ण जनाधार है। करहल सीट की राजनीतिक पहचान 1993 के बाद से सपा के लिए मजबूत रही है। विधानसभा क्रमांक 410 है।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: मैनपुरी
विधानसभा क्रमांक: 110
लोकसभा क्षेत्र: मैनपुरी
आरक्षण: सामान्य (कोई आरक्षण नहीं)
अनुमानित आबादी: लगभग 3,75,000
साक्षरता दर: लगभग 70%
लिंग अनुपात: 842/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन
हिंदू: 95%
मुस्लिम: 5%
अन्य समुदाय: बहुत कम
अनुसूचित जाति: लगभग 14-15%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2024 के उपचुनाव
विजेता: तेज प्रताप यादव (सपा)
उपविजेता: अनुजेश यादव (भाजपा)
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: लगभग 3,82,000
विजेता: अखिलेश यादव (सपा)
वोट शेयर: लगभग 60.12%
उपविजेता: डॉ. एसपी सिंह बघेल (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: लगभग 60%
करहल विधानसभा, मैनपुरी जिले की एक अहम सीट, लंबे समय से समाजवादी पार्टी का गढ़ रही है और यहां यादव समुदाय का खासा प्रभाव देखा जाता है। 1993 के बाद से इस सीट पर लगभग लगातार सपा का कब्जा रहा है, सिवाय 2002 के जब सोबरन सिंह यादव भाजपा के टिकट पर जीते, हालांकि बाद में वे भी सपा में शामिल हो गए। 2007 से 2017 तक वे सपा के विधायक रहे। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यहां से जीत दर्ज की और विपक्ष के नेता बने, लेकिन लोकसभा चुनाव लड़ने के चलते इस सीट पर 2024 में उपचुनाव हुए। उस उपचुनाव में अखिलेश यादव के भतीजे तेज प्रताप यादव ने भाजपा प्रत्याशी अनुजेश यादव को करीब 14,700 वोटों से हराकर पार्टी का दबदबा कायम रखा। दिलचस्प बात यह रही कि दोनों उम्मीदवार यादव समुदाय से थे, जिससे यह मुकाबला सिर्फ दलों का नहीं, बल्कि परिवारिक और जातीय प्रभाव का भी प्रतीक बना। करहल की राजनीति में यादव, शाक्य, ठाकुर, मुस्लिम, बघेल, लोधी, ब्राह्मण और बनिया जैसे समुदायों की अहम भूमिका रहती है। 2022 में अखिलेश यादव को लगभग 60.12% वोट शेयर मिला और करीब 60% मतदान हुआ। 2024 के उपचुनाव में भाजपा ने यादव कार्ड खेलकर मुकाबला जरूर कड़ा किया, लेकिन सपा ने अपनी पारंपरिक पकड़ बरकरार रखी। करहल की राजनीति में जातीय संतुलन और परिवारिक राजनीति का प्रभाव भविष्य में भी अहम बना रहेगा।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
तेज प्रताप यादव, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गांव में हुआ, समाजवादी पार्टी के उभरते हुए युवा नेता हैं और फिलहाल करहल विधानसभा सीट से विधायक हैं। वे मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पोते हैं, यानी अखिलेश यादव के चचेरे भाई। राजनीति में उनकी शुरुआत 2011 में सैफई ब्लॉक प्रमुख के तौर पर निर्विरोध चुने जाने से हुई। इसके बाद 2014 में उन्होंने मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव जीतकर संसद में कदम रखा। शिक्षा के लिहाज से उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, नोएडा से पढ़ाई की, फिर एमिटी यूनिवर्सिटी से बी.कॉम (ऑनर्स) और लीड्स यूनिवर्सिटी (UK) से एम.एससी. इन मैनेजमेंट की डिग्री ली। साल 2015 में उन्होंने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी राजलक्ष्मी यादव से विवाह किया। 2024 के करहल उपचुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और भाजपा प्रत्याशी अनुजेश यादव को हराकर जीत हासिल की। उनकी राजनीतिक पहचान एक पढ़े-लिखे, साफ-सुथरे और संगठन को मजबूत करने वाले नेता के रूप में बनी हुई है। चुनावी हलफनामे के मुताबिक उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
करहल विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में करहल विधानसभा क्षेत्र की राजनीति जातीय समीकरण, परिवारिक प्रभाव और स्थानीय विकास जैसे अहम मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यह इलाका यादव बहुल है, लेकिन शाक्य, जाटव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोधी और मुस्लिम समुदायों की भी निर्णायक भूमिका रहती है, जिनके गठजोड़ का सीधा असर वोटिंग पैटर्न पर पड़ता है। समाजवादी पार्टी का यह पारंपरिक गढ़ अखिलेश यादव की वजह से खासा सुर्खियों में रहा है, जिन्होंने 2022 के चुनाव में भाजपा के एसपी सिंह बघेल को भारी मतों से हराया। वहीं 2024 के उपचुनाव में सपा के तेज प्रताप यादव और भाजपा के अनुजेश यादव के बीच मुकाबला परिवारिक टकराव का रूप ले चुका था, जिसमें सपा ने करीब 14,700 वोटों से जीत हासिल की, हालांकि भाजपा ने अपने वोट शेयर में सुधार किया, जो क्षेत्रीय संतुलन में बदलाव का संकेत देता है। विकास की बात करें तो करहल में अब भी सड़कों, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ग्रामीण मतदाताओं के बीच चिंता का विषय बनी हुई है। साथ ही, यह कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण किसानों की समस्याएं, सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य और युवाओं के लिए रोजगार की कमी लगातार चुनावी बहस का हिस्सा बनी रही हैं। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी और स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप भी आम लोगों की नाराजगी का कारण रहे हैं। कुल मिलाकर, करहल की राजनीति जातीय समीकरण, परिवारिक ध्रुवीकरण और जमीनी मुद्दों के बीच संतुलन साधने की कोशिश करती दिखी है, और ये सारे पहलू आने वाले चुनावों में भी अहम भूमिका निभाते रहेंगे।