खतौली विधानसभा सीट - Muzaffarnagar

खतौली

वर्तमान विधायक
मदन भैया
जिला
Muzaffarnagar
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
राष्ट्रीय लोक दल
कुल मतदाता
2,21,969
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
मुजफ्फरनगर
खतौली विधानसभा सीट
खतौली विधानसभा उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की एक प्रमुख और सामाजिक रूप से विविध सीट है। यह विधानसभा क्रमांक 15 है और मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। सीट पर कोई आरक्षण लागू नहीं है। खतौली क्षेत्र शहरी और ग्रामीण के मिश्रण के साथ गन्ना, खेती और व्यापार के लिए जाना जाता है। जनसंख्या में जाट, मुस्लिम, सैनी, वाल्मीकि, दलित, ब्राह्मण और अन्य समुदाय निवास करते हैं।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: मुजफ्फरनगर
विधानसभा क्रमांक: 15
लोकसभा क्षेत्र: मुजफ्फरनगर
आरक्षण: सामान्य (अनारक्षित)
अनुमानित आबादी: लगभग 4,33,910
साक्षरता दर: 73.47%
लिंग अनुपात: 898/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन
हिंदू: 65.7%
मुस्लिम: 33%
अन्य समुदाय: 1.3%
अनुसूचित जाति: करीब 17.3%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 (उपचुनाव)
कुल मतदाता: 2,21,969
विजेता: मदन भैया (राष्ट्रीय लोकदल)
वोट शेयर: 54.04%
उपविजेता: राजकुमारी सैनी (भाजपा)
वोट शेयर: 41.72%
मतदान प्रतिशत: 57.38%
2022 आम चुनाव (मार्च):
विजेता: विक्रम सैनी (भाजपा)
वोट शेयर: 45.5%
उपविजेता: राजपाल सिंह सैनी (राष्ट्रीय लोकदल)
मतदान प्रतिशत: 69.79%
खतौली विधानसभा का राजनीतिक इतिहास हमेशा बदलावों से भरा रहा है। यहाँ मतदाताओं ने कभी किसी एक पार्टी को लंबे समय तक मौका नहीं दिया। अलग-अलग दौर में CPI, कांग्रेस, लोकदल, भाजपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार जीतते रहे हैं। 2017 और 2022 के आम चुनाव में भाजपा के विक्रम सैनी लगातार विजयी रहे, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगा मामले में सजा के बाद उनकी सदस्यता खत्म हुई और उपचुनाव हुआ। इस उपचुनाव में राष्ट्रीय लोकदल-सपा गठबंधन के मदन भैया (मदन सिंह कसाना) ने भाजपा की राजकुमारी सैनी को 22,165 वोटों से हराकर न सिर्फ सीट जीती, बल्कि 5वीं बार विधायक बनने का रिकॉर्ड भी बनाया। इस जीत में दलित, मुस्लिम और जाट वोटरों का गठजोड़ निर्णायक साबित हुआ, हालांकि मतदाताओं का उत्साह सामान्य से कम रहा। कुल मिलाकर, हालिया नतीजों ने भाजपा का वर्चस्व तोड़ा और राष्ट्रीय लोकदल-सपा गठबंधन को पश्चिमी यूपी में नया राजनीतिक बल प्रदान किया।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
मदन सिंह कसाना, जिन्हें इलाके में लोग 'मदन भैया' के नाम से जानते हैं, 11 सितंबर 1959 को गाजियाबाद के गांव जवली में जन्मे और गुरजर समुदाय के एक प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। पांच बार विधायक रह चुके मदन भैया चार बार बागपत की खेक्रा सीट और एक बार खतौली से चुने गए हैं। कॉलेज के दिनों से राजनीति में सक्रिय, उनकी छवि एक बहुबली नेता की रही है, जिन्हें स्थानीय लोग “रॉबिन हुड” भी कहते हैं। सुरक्षा कारणों से वे बुलेटप्रूफ गाड़ी और सुरक्षाबलों के साथ चलते हैं। उनके खिलाफ 1990 के दशक से अब तक हत्या, डकैती और सरकारी अधिकारी पर हमले जैसे गंभीर आरोपों वाले करीब 32 आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, जिनमें कई गाजियाबाद, बागपत, मेरठ और दिल्ली में हैं। वे तीन बार गैंगस्टर और एंटी-सोशल एक्ट के तहत और एक बार राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत कार्रवाई का सामना कर चुके हैं, हालांकि खतौली क्षेत्र में उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है। 1991 से 2007 तक खेक्रा सीट से जनता पार्टी, सपा, निर्दलीय और अंततः रालोद के टिकट पर जीतते रहे, जबकि परिसीमन के बाद लोनी से चुनाव हार गए। 2022 के खतौली उपचुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को बड़े अंतर से हराकर राष्ट्रीय लोकदल-सपा गठबंधन को जीत दिलाई। विवादों के बावजूद, पश्चिमी यूपी की राजनीति में उनकी पकड़ और गुरजर समाज में उनकी साख बेहद मजबूत है।
खतौली विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में खतौली विधानसभा की राजनीति जातीय समीकरण, किसान समस्याओं, विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था और चुनावी ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यहाँ जाट, मुस्लिम, गुर्जर, दलित, सैनी, पाल, कश्यप, वैश्य और ठाकुर जैसी कई जातियों का असर है, जिनमें लगभग मुस्लिम, दलित, सैनी, पाल और कश्यप मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। राष्ट्रीय लोकदल-सपा गठबंधन ने जाट-मुस्लिम-गुर्जर समीकरण पर दांव लगाया, जबकि भाजपा ने सैनी, दलित और अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की कोशिश की। गन्ना किसानों की कीमत, भुगतान में देरी, मिल प्रबंधन और सिंचाई सुविधाओं में सुधार की मांग चुनावी बहस के केंद्र में रही। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी बड़ा मुद्दा बना, जो 2022 में भाजपा विधायक विक्रम सैनी को सजा और उपचुनाव के दौरान फिर चर्चा में आया। विकास मोर्चे पर सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं की मांग रही, जबकि बिजली व्यवस्था पर लोगों की राय अपेक्षाकृत सकारात्मक रही। 2022 के उपचुनाव में भाजपा और राष्ट्रीय लोकदल-सपा गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला हुआ, जो पश्चिमी यूपी के सियासी माहौल के लिए एक तरह का लिटमस टेस्ट साबित हुआ। बसपा के मैदान में न होने से दलित वोटरों के रुझान पर सभी की नजर रही। भाजपा ने इन्हें अपने पक्ष में लाने की रणनीति बनाई, तो गठबंधन ने अल्पसंख्यकों और पिछड़ों की लामबंदी पर जोर दिया। कुल मिलाकर, जातीय संतुलन, किसान हित और सांप्रदायिक मुद्दे खतौली की सियासत के सबसे बड़े निर्धारक रहे।

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