लखनऊ मध्य विधानसà¤à¤¾ सीट - Lucknow
लखनऊ मध्य |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री रविदास मेहरोत्रा |
| जिला | Lucknow |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | लखनऊ |
लखनऊ सेंट्रल विधानसभा सीट
लखनऊ सेंट्रल विधानसभा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सबसे पुराने और व्यावसायिक, प्रशासनिक व शहरी इलाकों को कवर करती है। यह क्षेत्र सामाजिक, धार्मिक और जातीय दृष्टि से विविध है। यहाँ व्यापार, मध्यमवर्ग, अल्पसंख्यक और सेवा क्षेत्र की भागीदारी प्रमुख है। विधानसभा क्रमांक 174 है और यह सीट लखनऊ लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। यहाँ ऐतिहासिक गली–कूचे, बाजार और प्रशासनिक संस्थान मौजूद हैं।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: लखनऊ
विधानसभा क्रमांक: 174
लोकसभा क्षेत्र: लखनऊ
आरक्षण: कोई नहीं (सामान्य)
अनुमानित आबादी: 3.5-3.7 लाख
साक्षरता दर: 77.29%
लिंग अनुपात: 917/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन
हिंदू: 65-70%
मुस्लिम: 28-32%
अन्य समुदाय: 2–3%
अनुसूचित जाति: 13-16%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,09,607
विजेता: रवीदास मेहरोत्रा (सपा)
वोट शेयर: 49.9%
उपविजेता: रजनीश गुप्ता (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 56.6%
लखनऊ सेंट्रल विधानसभा सीट राजधानी के सबसे अहम और राजनीतिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में गिनी जाती है। इसका राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है 1951 से 1985 तक यहां कांग्रेस का दबदबा कायम रहा, लेकिन 1989 में भाजपा ने पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की और 2007 तक अपना वर्चस्व बनाए रखा। इस दौरान बसंत लाल गुप्ता, राम प्रकाश और सुरेश कुमार श्रीवास्तव जैसे नेता भाजपा से लगातार विजयी होते रहे। 2012 में समाजवादी पार्टी के रविदास मेहरोत्रा ने भाजपा की जीत की इस कड़ी को तोड़ा और बड़ी जीत हासिल की। हालांकि 2017 में भाजपा ने बृजेश पाठक को मैदान में उतारकर सीट वापस ले ली। 2022 के चुनाव में मुकाबला फिर से भाजपा और सपा के बीच ही रहा, जिसमें रविदास मेहरोत्रा ने भाजपा के रजनीश गुप्ता को 10,935 वोटों से हराकर सीट सपा के खाते में पहुंचा दी। यह सीट सामाजिक रूप से बेहद विविध है ब्राह्मण, कायस्थ, मुस्लिम, ओबीसी और व्यापारी वर्ग के मतदाता यहां चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले तीन दशकों में यहां भाजपा, सपा और कांग्रेस के बीच सत्ता का फेरबदल देखने को मिला है, लेकिन फिलहाल मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और सपा के बीच सिमट गया है। क्षेत्र की शहरी समस्याएं, जनसंपर्क और सामाजिक समीकरण चुनावी रुझानों को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
रविदास मेहरोत्रा समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं, जो इस समय लखनऊ मध्य (सेंट्रल) विधानसभा सीट से विधायक हैं। उनका जन्म 21 अप्रैल 1955 को लखनऊ में हुआ था और वे छात्र राजनीति से ही सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। 1989 में उन्होंने जनता दल के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा में कदम रखा, लेकिन बाद में वे पूरी तरह समाजवादी पार्टी से जुड़ गए और 2012 व 2022 में सपा से विधायक बने। सपा सरकार में वे मंत्री भी रह चुके हैं और समाजवादी विचारधारा के सशक्त पैरोकार माने जाते हैं। उनका राजनीतिक सफर जनआंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अब तक 251 बार जेल जा चुके हैं, जिसके लिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है। जहां तक आपराधिक मामलों की बात है, साल 2022 के चुनावी शपथपत्र के अनुसार, उनके खिलाफ करीब 22 मामले दर्ज हैं।
लखनऊ सेंट्रल विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में लखनऊ सेंट्रल विधानसभा क्षेत्र में आम लोगों ने कई अहम समस्याओं का सामना किया, जो अब तक पूरी तरह से हल नहीं हो सकीं। क्षेत्र की पुरानी कॉलोनियों में जल निकासी, सीवर लाइन, साफ-सफाई और सड़क मरम्मत जैसी बुनियादी सुविधाओं की हालत लगातार खराब रही, जिससे लोग खासे नाराज़ नजर आए। सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों, दवाओं और जरूरी उपकरणों की भारी कमी रही, जो न सिर्फ जनता की चिंता का विषय बना, बल्कि विधानसभा में भी इसे लेकर सवाल उठे। ट्रैफिक जाम, अवैध पार्किंग और अतिक्रमण भी क्षेत्र के व्यस्त बाजारों और तंग गलियों में रोजमर्रा की परेशानी का कारण बने। कोविड-19 के बाद छोटे व्यापारियों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए रोजगार और वित्तीय सहायता एक बड़ा मुद्दा रहा। वहीं, सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत, खराब शिक्षा व्यवस्था और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर भी लोगों ने लगातार सवाल उठाए। गर्मियों में पेयजल की भारी किल्लत और स्वच्छ जल की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। इसके अलावा, विपक्ष ने इलाके के विकास में भेदभाव और बजट आवंटन की पारदर्शिता को लेकर भी सरकार को घेरा। महंगाई और बढ़ती आर्थिक असमानता ने आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। इन तमाम मुद्दों को लेकर विधानसभा और बजट सत्रों में खूब चर्चा हुई, लेकिन जमीनी हकीकत में ये समस्याएं अब भी क्षेत्रवासियों की प्रमुख चिंताएं बनी हुई हैं।