मंझनपुर विधानसà¤à¤¾ सीट - Kaushambi
मंझनपुर |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री इन्द्रजीत सरोज |
| जिला | Kaushambi |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | कौशांबी |
मंझनपुर विधानसभा सीट
मंझनपुर विधानसभा उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में स्थित एक प्रमुख निर्वाचन क्षेत्र है। यह क्षेत्र सामाजिक, जातीय और राजनीतिक दृष्टि से विविधता लिए हुए है। मंझनपुर, कौशांबी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सीट है। इसका विधानसभा क्रमांक 252 है।
जनसंख्या (जनगणना 2011):
जिला: कौशांबी
विधानसभा क्रमांक: 252
लोकसभा क्षेत्र: कौशांबी (एससी)
आरक्षण: अनुसूचित जाति (एससी)
अनुमानित आबादी: लगभग 5.6 लाख (2011 तहसील)
साक्षरता दर: 60-65%
लिंग अनुपात: 910/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन (तहसील स्तर)
हिंदू: 87.8%
मुस्लिम: 11.8%
अन्य समुदाय: 0.4%
अनुसूचित जाति: लगभग 9.78%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,54,596
विजेता: इंद्रजीत सरोज (सपा)
वोट शेयर: 47.7%
उपविजेता: लाल बहादुर (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 61.6%
मंझनपुर विधानसभा सीट (कौशांबी) लंबे समय तक बसपा का मजबूत गढ़ रही है, जहां इंद्रजीत सरोज ने 2002, 2007 और 2012 में लगातार जीत हासिल की। लेकिन 2017 में पहली बार भाजपा के लाल बहादुर ने इस पर कब्जा जमाया और बसपा को हराया। हालांकि 2022 में फिर से इंद्रजीत सरोज समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर वापस आए। यहां की राजनीति हमेशा दिलचस्प रही है क्योंकि यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और पासी, धोबी, दलित, ब्राह्मण, मौर्य, यादव और पटेल जैसे समुदायों के मतदाता चुनाव में बड़ी भूमिका निभाते हैं। आमतौर पर सपा, भाजपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होता है। 2022 के चुनाव में कुल 3.88 लाख मतदाताओं में से 47.20% ने वोट डाले, जिसमें सपा के इंद्रजीत सरोज को 1.21 लाख वोट मिले और उन्होंने भाजपा के लाल बहादुर को करीब 24 हजार वोटों से हराया। बसपा की नीतू कनौजिया तीसरे नंबर पर रहीं। कुल मिलाकर मंझनपुर की राजनीति में जातीय समीकरण और पुराने नेताओं की पकड़ आज भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
इंद्रजीत सरोज उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के नगरेहा खुर्द गांव के रहने वाले हैं और एक दलित (पासी) किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने 1985 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और तभी से सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय हो गए। अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत उन्होंने बसपा से की और कांशीराम व मायावती के करीबी माने जाते थे। 1996 से 2012 तक लगातार मंझनपुर सीट से विधायक रहे और मायावती सरकार में तीन बार मंत्री भी बने। 2018 में उन्होंने बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया और अब वे सपा के राष्ट्रीय महासचिव और मंझनपुर से विधायक हैं। इसके साथ ही विधानसभा में विपक्ष के उपनेता की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। 2022 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज है।
मंझनपुर विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में मंझनपुर विधानसभा क्षेत्र में जनता की चर्चा और राजनीति मुख्य रूप से कुछ अहम मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही। क्षेत्र में अब भी जलभराव, खराब सड़कों, सफाई और नाली की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, जिससे लोगों को खासकर बारिश में काफी दिक्कत होती है। किसानों को सिंचाई, खाद-बीज, फसल बीमा और भुगतान जैसी बुनियादी परेशानियों का सामना करना पड़ा। चूंकि यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, इसलिए दलित और पिछड़े वर्ग की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय से जुड़ी आवाजें भी लगातार उठती रहीं। राजनीतिक लिहाज से यहां स्थिति बदलती रही 2017 में भाजपा ने जीत दर्ज की, लेकिन 2022 में समाजवादी पार्टी ने सत्ता वापस ले ली। ऐसे बदलावों का असर विकास की रफ्तार और प्राथमिकताओं पर भी पड़ा। इसके अलावा, मंझनपुर की ऐतिहासिक पहचान, जिसे जैन-बौद्ध नगरी के रूप में जाना जाता है, वह भी उपेक्षित रही। स्थानीय लोग इसके संरक्षण और पर्यटन विकास की मांग करते रहे हैं।