मेरठ विधानसà¤à¤¾ सीट - Meerut
मेरठ |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री रफीक अंसारी |
| जिला | Meerut |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | मेरठ |
मेरठ विधानसभा क्षेत्र
मेरठ विधानसभा उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है और मेरठ लोकसभा क्षेत्र का भाग है। शहर ऐतिहासिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह सीट अनारक्षित (सामान्य) है और यहां सामाजिक, धार्मिक, व जातीय विविधता देखने को मिलती है। राजनीतिक रूप से यह क्षेत्र बीजेपी, सपा और कभी-कभी कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला स्थल रहा है।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: मेरठ
विधानसभा क्रमांक: 48
लोकसभा क्षेत्र: मेरठ
आरक्षण: सामान्य (अनारक्षित)
अनुमानित आबादी: लगभग 5,66,000
साक्षरता दर: लगभग 72.84%
लिंग अनुपात: 886/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन (अनुमानित)
हिंदू: 63.40%
मुस्लिम: 34.43%
अन्य समुदाय: 2% से भी कम
अनुसूचित जाति: लगभग 15-20%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,01,018
विजेता: रफीक अंसारी (सपा)
वोट शेयर: 52.9%
उपविजेता: कमल दत्त शर्मा (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 64.3%
मेरठ कैंट विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प और स्थिर रहा है। 1974 से 1985 तक यह सीट कांग्रेस के पास रही, लेकिन 1989 में जब बीजेपी के परमात्मा शरण मित्तल ने कांग्रेस के अजीत सिंह सेठी को हराया, तब से यह सीट बीजेपी के कब्जे में है। इसके बाद अमित अग्रवाल और फिर सत्य प्रकाश अग्रवाल जैसे नेताओं ने इस सीट को बीजेपी के लिए एक मजबूत गढ़ बना दिया। सत्य प्रकाश अग्रवाल ने तो 2002 से 2017 तक लगातार चार बार जीत हासिल की। 2022 में पार्टी ने प्रत्याशी बदला और फिर से अमित अग्रवाल को टिकट दिया और बीजेपी ने अपनी पकड़ कायम रखी। दिलचस्प बात यह है कि मेरठ कैंट में वोटिंग जातिगत आधार पर कम और पार्टी लाइन पर ज़्यादा होती है। शहरी और अपेक्षाकृत विकसित क्षेत्र होने के कारण यहां के चुनावी मुद्दे भी कुछ अलग होते हैं जैसे छावनी कानून से जुड़ी समस्याएं, स्थानीय विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था। करीब 4 लाख मतदाताओं वाले इस सीट पर वैश्य, पंजाबी, दलित, मुस्लिम और जाट जैसे विविध समुदायों की मौजूदगी है, लेकिन फिर भी बीजेपी पिछले तीन दशकों से यहां की राजनीति पर लगातार हावी रही है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
रफीक अंसारी समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और मेरठ विधानसभा सीट से विधायक के तौर पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनका जन्म मेरठ के एक बुनकर परिवार में हुआ था और उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई की है। राजनीति में उनकी शुरुआत पार्षद के रूप में हुई, जहां वे सपा के टिकट पर लगातार तीन बार चुने गए। 2012 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गए, बावजूद इसके उन्हें सपा सरकार में हथकरघा और पर्यटन विभाग में दर्जा प्राप्त मंत्री बनाया गया। 2017 में पहली बार विधायक बने और 2022 में दोबारा जीत हासिल की। हालांकि, उनका राजनीतिक सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 1992 और 1995 में हुए हंगामे और आगजनी से जुड़े मामलों में उनके खिलाफ कई आपराधिक केस दर्ज हुए और एक समय पर 101 गैर-जमानती वारंट तक जारी हुए थे। 2020 में एक पुराने मामले में गिरफ्तारी का वारंट निकला और 2024 में वे बाराबंकी से गिरफ्तार होकर करीब 56 दिन जेल में भी रहे, हालांकि पुलिस उनके खिलाफ ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी और अंततः वे बरी हो गए। बावजूद इन विवादों के, रफीक अंसारी सपा में मजबूत पकड़ रखते हैं और मेरठ जिले में गैर-भाजपा विधायक के रूप में उन्हें असरदार नेता माना जाता है। कुल मिलाकर 2022 चुनावी हलफनामें के अनुसार इनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज है।
मेरठ विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में मेरठ कैंट विधानसभा क्षेत्र में जिन मुद्दों ने सबसे ज़्यादा चर्चा बटोरी, वे सीधे जनता की ज़िंदगी से जुड़े रहे। चाहे वो बुनियादी विकास हो, बेरोज़गारी, महंगाई या कानून-व्यवस्था की हालत। योगी सरकार के आठ सालों में करीब 6.25 अरब रुपये की विकास परियोजनाएं यहां लागू की गईं, जिनमें मल्टीलेवल पार्किंग, एलिवेटेड रोड, लिंक मार्ग और रिंग रोड जैसे बड़े काम शामिल रहे। इनका मकसद था शहर की ट्रैफिक और पार्किंग की दिक्कतों को कम करना। लेकिन इन विकास कार्यों के साथ-साथ जनता का ध्यान कानून-व्यवस्था पर भी रहा, खासकर सोतीगंज जैसे इलाकों में चोरी-डकैती और कबाड़ी कारोबार को लेकर सवाल उठते रहे। आर्थिक मोर्चे पर भी जनता परेशान दिखी बेरोज़गारी और महंगाई ने आम लोगों की जेब पर असर डाला और ये मुद्दे चुनावी नारों में शामिल हो गए। वहीं, राजनीतिक समीकरण भी दिलचस्प रहे। 2019 में भाजपा को सिर्फ 4,729 वोटों से जीत मिली थी, जो बताता है कि कैंट जैसे सीटों पर मुकाबला काफी कड़ा रहा है, खासकर जब दलित, मुस्लिम और ओबीसी वोट निर्णायक भूमिका में हों। भाजपा ने जहां नई रणनीति के तहत प्रत्याशियों में बदलाव किया, वहीं सपा-बसपा ने अपने समीकरण दलित और मुस्लिम उम्मीदवारों पर केंद्रित किए। कुल मिलाकर, विकास, सुरक्षा, रोजगार और जातीय राजनीति। इन सभी ने मेरठ कैंट की राजनीति को पिछले कुछ वर्षों में दिशा दी है।