मिल्कीपुर विधानसभा सीट - Faizabad

मिल्कीपुर

वर्तमान विधायक
चन्द्रभानु पासवान
जिला
Faizabad
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
फैज़ाबाद
मिल्कीपुर विधानसभा सीट
मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र (संख्या 273) उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में स्थित है और यह फैज़ाबाद लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। इस सीट की स्थापना 1967 में हुई थी और यह अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है। यह क्षेत्र मुख्यतः ग्रामीण है और इसमें 280 गांव शामिल हैं। इस सीट पर समाजवादी पार्टी (सपा), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सहित प्रमुख दलों का प्रतिनिधित्व रहा है।
जनसंख्या एवं जनगणना 2011
जिला: अयोध्या
लोकसभा क्षेत्र : फैज़ाबाद
विधानसभा संख्या: 273
आरक्षण स्थिति: अनुसूचित जाति (एससी)
कुल जनसंख्या: 4,79,707
पुरुष: 2,41,672
महिलाएं: 2,38,035
लिंगानुपात:985/1000
साक्षरता दर: 66.8%
धार्मिक और सामाजिक संरचना
ब्राह्मण: 60,000
यादव: 55,000
पासी: 55,000
मुस्लिम: 30,000
राजपूत: 25,000
अनुसूचित जाति (दलित): लगभग 30%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,44,356
विजेता: अवधेश प्रसाद (सपा)
वोट शेयर: 48.4%
उपविजेता: बाबा गोरखनाथ (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 60.1%
2025 (उपचुनाव परिणाम)
विजेता: चंद्रभानु पासवान (भाजपा)
वोट शेयर: 60.17%
उपविजेता: अजीत प्रसाद (सपा)
मिल्कीपुर विधानसभा सीट का गठन 1967 के परिसीमन के बाद हुआ था और 1969 में यहां से जनसंघ के हरिनाथ तिवारी पहले विधायक चुने गए। इसके बाद यह क्षेत्र लंबे समय तक समाजवादी और वामपंथी विचारधारा का गढ़ बना रहा, जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और बाद में समाजवादी पार्टी (सपा) का वर्चस्व रहा। मित्रसेन यादव और अवधेश प्रसाद जैसे नेताओं ने यहां मजबूत राजनीतिक पकड़ बनाई। अवधेश प्रसाद ने 2012 और 2022 में सपा के टिकट पर जीत दर्ज की और वे छह बार उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में अवधेश प्रसाद ने फैज़ाबाद सीट से भाजपा के लल्लू सिंह को हराकर संसद पहुंचे, जिससे मिल्कीपुर सीट खाली हुई और 2025 में उपचुनाव कराए गए। इस उपचुनाव में भाजपा ने चंद्रभानु पासवान को और सपा ने अवधेश प्रसाद के बेटे अजीत प्रसाद को मैदान में उतारा, जबकि आज़ाद समाज पार्टी से सूरज चौधरी के आने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया। इस क्षेत्र में पासी समुदाय सहित अनुसूचित जाति और यादव जैसे ओबीसी समुदायों का वर्चस्व है, जो चुनावी समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2025 के उपचुनाव में भाजपा ने 58 वर्षों में तीसरी बार यह सीट जीतकर समाजवादी पार्टी की पारंपरिक पकड़ को चुनौती दी। इस चुनाव में बसपा ने भाग नहीं लिया, जबकि कांग्रेस ने सपा को समर्थन दिया। हाल के वर्षों में भाजपा ने जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधते हुए मिल्कीपुर में अपनी पकड़ मज़बूत की है, जिससे अब यहां मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और सपा के बीच सिमट गया है, हालांकि तीसरे दलों की उपस्थिति चुनाव को जटिल बनाए रखती है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
चंद्रभानु पासवान, भाजपा के नेता, वर्तमान में मिल्कीपुर (अयोध्या) विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वे बी.कॉम, एम.कॉम और एलएलबी की डिग्रियां प्राप्त कर चुके हैं और पेशे से वकील व साड़ी व्यवसायी हैं। पासी समुदाय से आने वाले चंद्रभानु पासवान का सामाजिक और राजनीतिक आधार मजबूत है। वे दो बार रुदौली से जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं और फिलहाल भाजपा जिला कार्य समिति के सदस्य हैं, जबकि उनकी पत्नी कंचन पासवान भी दो बार जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। उनके पिता रामलखन पासवान ग्राम प्रधान रह चुके हैं। 2025 के उपचुनाव में उन्होंने मिल्कीपुर सीट से भाजपा के टिकट पर ऐतिहासिक जीत हासिल की, जिसमें उन्हें 61,000 से अधिक वोटों से सफलता मिली। कोविड महामारी के दौरान जरूरतमंदों को राशन, भोजन और प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने जैसे सामाजिक कार्यों के लिए भी वे सुर्खियों में रहे। चुनावी हलफनामों के अनुसार, उनके खिलाफ किसी प्रकार का आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
मिल्कीपुर विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में कई गंभीर और संवेदनशील मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रहे हैं। 2025 के उपचुनाव के दौरान एक दलित युवती के साथ हुई बर्बरता और हत्या ने कानून व्यवस्था को सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया, जिससे दलित, आदिवासी और कमजोर वर्गों की सुरक्षा तथा न्याय की मांग ने ज़ोर पकड़ा। इस घटना को लेकर विपक्षी दलों कांग्रेस, सपा और बसपा ने भाजपा सरकार और पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता पर तीखा प्रहार किया। इसके साथ ही उपचुनाव में निष्पक्षता पर भी सवाल उठे, जब सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर धांधली, फर्जी वोटिंग और बूथ एजेंटों को धमकाने के आरोप लगाए। विकास के मोर्चे पर भी क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी जनता के बीच निरंतर चिंता का विषय बनी रही, खासकर ग्रामीण इलाकों में योजनाओं का लाभ नहीं मिलना बड़ा मुद्दा रहा। रोजगार की कमी और युवाओं का पलायन भी सामाजिक-आर्थिक चुनौती बना रहा, जिससे शिक्षा और कौशल विकास की मांग बढ़ी। जातिगत समीकरणों में दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग की बड़ी संख्या ने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुख बनाए रखा। साथ ही, लगातार हो रहे उपचुनावों और भाजपा-सपा के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा ने क्षेत्र की राजनीतिक अस्थिरता और सक्रियता को और बढ़ाया।

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