नगीना विधानसà¤à¤¾ सीट - Bijnor
नगीना |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | मनोज कुमार पारस |
| जिला | Bijnor |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | 2,22,099 |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | नगीना |
नगीना विधानसभा सीट
नगीना, उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद में स्थित विधानसभा क्षेत्र संख्या 18 है। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और नगीना लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। इस विधानसभा क्षेत्र में नगीना नगर, नजीबाबाद और नगीना तहसील के कुछ भागों के साथ-साथ कई गांव शामिल हैं।
जनसंख्या विभाजन (जनगणना 2011)
नगीना नगर (शहरी केंद्र):
कुल जनसंख्या: 95,246
पुरुष: 49,890
महिला: 45,356
नगीना तहसील:
कुल जनसंख्या: 5,02,488
पुरुष: 2,60,034
महिला: 2,42,454
लिंगानुपात: 932/1,000
साक्षरता दर: 63.47%
अनुसूचित जाति जनसंख्या: 22.2%
अनुसूचित जनजाति जनसंख्या: 0.5%
धार्मिक और सांप्रदायिक विभाजन (जनगणना 2011)
हिंदू: 50.73%
मुस्लिम: 46.1%
सिख: 2.79%
ईसाई: 0.12%
बौद्ध: 0.14%
जैन: 0.03%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,22,099
विजेता: मनोज कुमार पारस (सपा)
वोट शेयर: 43.7%
उपविजेता: डॉ यशवंत सिंह (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 64.3%
नगीना विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास 1957 से शुरू होता है, जब से यह सीट विविध राजनीतिक उतार-चढ़ाव का गवाह रही है। 1957 से 1974 तक यहां कांग्रेस का वर्चस्व रहा, जिसमें गोविंद सहाय, अतीक रहमान और गंगा देवी जैसे नेता विधायक बने। 1977 से 1990 के बीच सत्ता का पलड़ा बार-बार बदला जनता पार्टी, कांग्रेस, भाजपा, बसपा और जनता दल जैसे दलों ने बारी-बारी से जीत दर्ज की। 1996 से 2007 तक ओमवती देवी ने सपा और बाद में बसपा से लगातार तीन बार जीत दर्ज कर प्रभावशाली उपस्थिति बनाई। इसके बाद 2012 और 2017 में सपा के मनोज कुमार पारस ने लगातार दो बार जीत हासिल की। नगीना सीट पर दलित, मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं और यही कारण है कि यहां सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला प्रमुख रहा है, जबकि भाजपा की पकड़ अब तक सीमित रही है। 2012 में मनोज कुमार पारस ने 46.04% वोटों के साथ जीत दर्ज की, जबकि बसपा और भाजपा क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहीं। 2017 और 2022 में भी सपा और बसपा के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला, जबकि भाजपा तीसरे स्थान तक सीमित रही। मुस्लिम (लगभग 50%) और अनुसूचित जाति (करीब 21%) की बड़ी आबादी के चलते दलित-मुस्लिम गठजोड़ चुनावी नतीजों को प्रभावित करता रहा है। लगातार बदलते चुनावी समीकरणों के कारण यह सीट राजनीतिक रूप से अस्थिर मानी जाती है, जहां किसी एक दल का लंबे समय तक दबदबा नहीं रहा है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
मनोज कुमार पारस, ग्राम बिन्जाहेड़ी, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में एक किसान परिवार में हुआ, वर्तमान में नगीना विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं। उन्होंने गढ़वाल यूनिवर्सिटी से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1993 में जनता दल से की, बाद में सपा में शामिल हो गए। वे 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन बार विधायक निर्वाचित हुए और 2012 में अखिलेश यादव सरकार में स्टाम्प शुल्क एवं न्यायालय शुल्क पंजीयन विभाग में राज्यमंत्री भी रहे। कृषि व्यवसाय से जुड़े पारस को नगीना क्षेत्र में दलित-मुस्लिम गठजोड़ के सशक्त प्रतिनिधि और लोकप्रिय नेता माना जाता है। हालांकि, उनके खिलाफ एक गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है 2007 में एक दलित महिला द्वारा सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था, जिसकी एफआईआर में उनका नाम भी शामिल है। 2012 में विधायक बनने के बाद यह मामला फिर चर्चा में आया; कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए और हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर लगी रोक हटा दी थी। 2019 में विशेष अदालत ने उन्हें जेल भेजा था, हालांकि मामला अभी भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है और अंतिम निर्णय आना बाकी है।
नगीना विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में नगीना विधानसभा क्षेत्र में कई गंभीर मुद्दे चुनावी विमर्श का हिस्सा बने रहे। यहां दलित और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर होने के कारण सामाजिक न्याय, आरक्षण और अल्पसंख्यक सुरक्षा जैसे विषय प्रमुख रहे और राजनीतिक दलों ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ को साधने के लिए रणनीतिक प्रयास किए, जिससे यह समीकरण चुनावों में निर्णायक बना रहा। स्थानीय विकास और बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो नगीना को अलग जिला बनाने, सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आधारभूत आवश्यकताओं की मांग लगातार उठती रही। लोगों का मानना है कि क्षेत्र के सांसद या विधायक के अक्सर बाहरी होने के कारण स्थानीय समस्याएँ उपेक्षित रहती हैं, जिससे विकास की गति धीमी रही। शिक्षा के क्षेत्र में बीटीसी और होम्योपैथिक कॉलेज जैसे संस्थानों का नगीना से बाहर जाना युवाओं और अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बना, जिससे उच्च शिक्षा के लिए पलायन बढ़ा। रोजगार की कमी, स्वरोजगार के संसाधनों का अभाव और औद्योगिक विस्तार न होने से बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या बनी रही। इसके अलावा, बाहरी प्रत्याशियों के चुनाव जीतने से स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की मांग भी जोर पकड़ती रही है।