नूरपुर विधानसà¤à¤¾ सीट - Bijnor
नूरपुर |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | रामअवतार सिंह सैनी |
| जिला | Bijnor |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | समाजवादी पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | नगीना |
नूरपुर विधानसभा सीट
नूरपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र भारत के उत्तर प्रदेश विधान सभा के 403 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। यह बिजनौर जिले का एक हिस्सा है और नगीना लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के पाँच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। इस विधानसभा क्षेत्र में पहला चुनाव 1967 में हुआ था जब 1964 में परिसीमन आदेश (परिसीमन आयोग (1964)) पारित किया गया था। 1976 में परिसीमन आदेश पारित होने के बाद निर्वाचन क्षेत्र का अस्तित्व समाप्त हो गया। 2008 में, 'संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008' पारित होने पर निर्वाचन क्षेत्र फिर से बनाया गया।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 24
जिला: बिजनौर
लोकसभा क्षेत्र: नगीना
आरक्षण स्थिति: सामान्य
मतदाता संख्या (2022): 2,13,969
साक्षरता दर: 68.48%
लिंग अनुपात: 936/1000
धार्मिक व साम्प्रदायिक आंकड़े
हिंदू: 27.78%
मुस्लिम: 62.87%
ईसाई: 0.20%
सिख: 9.12%
जातीय समीकरण:
अनुसूचित जाति: 20%
अन्य प्रमुख समुदाय: ओबीसी, जाट, त्यागी, ब्राह्मण, मुस्लिम
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,13,023
विजेता: राम अवतार सिंह (सपा)
वोट शेयर: 43.5%
उपविजेता: चंद्रप्रकाश सिंह (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 65.8%
नूरपुर विधानसभा सीट का गठन 2008 के परिसीमन के बाद हुआ और यहां पहला चुनाव 2012 में आयोजित हुआ। शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दबदबा रहा, जहां लोकेश सिंह ने 2012 और 2017 में लगातार जीत दर्ज की। हालांकि, 2018 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) ने पहली बार यह सीट अपने नाम की, जिसे 2022 में भी बरकरार रखा। 2022 के चुनाव में सपा के राम अवतार सिंह ने भाजपा के चंद्रप्रकाश सिंह को 6,065 वोटों से हराया। यह चुनाव त्रिकोणीय मुकाबले के बावजूद भाजपा और सपा के बीच सीधी टक्कर में बदल गया। बसपा के हाजी जियाउद्दीन अंसारी तीसरे स्थान पर रहे और पार्टी का वोट शेयर घटकर 14.63% रह गया। नूरपुर की राजनीति में मुस्लिम, दलित और ओबीसी मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। 2012 से 2017 तक भाजपा का प्रभाव रहा, लेकिन 2018 से सपा ने अपनी स्थिति मजबूत की है। लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा और घटते जीत के अंतर इस सीट को राजनीतिक रूप से अस्थिर और दिलचस्प बना देते हैं।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
राम अवतार सिंह, जिन्हें कभी-कभी राम अवतार सैनी के नाम से भी जाना जाता है, उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के गनौरा गांव के एक सामान्य किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने अपनी शिक्षा स्थानीय स्तर पर पूरी की और ग्रामीण जीवन की चुनौतियों को नजदीक से समझा, जिससे उनकी जनता से गहरी जुड़ाव की छवि बनी। अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से की, लेकिन जनवरी 2022 में स्वामी प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल हो गए। 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सपा प्रत्याशी के रूप में नूरपुर सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा के सी.पी. सिंह को 6,065 वोटों के अंतर से हराकर पहली बार विधायक बने। उनकी राजनीतिक पहचान एक साफ-सुथरी, विवाद-मुक्त और स्थानीय मुद्दों की समझ रखने वाले नेता के रूप में बनी है। 2022 के चुनावी हलफनामे और अगस्त 2024 तक के सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
नूरपुर विधानसभा : पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
नूरपुर क्षेत्र में सड़क और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। बरसात के मौसम में जलभराव और जर्जर सड़कों की समस्या विशेष रूप से ग्रामीण और शहरी इलाकों में जनता को प्रभावित करती है। सड़क, जल निकासी, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी को लेकर लगातार असंतोष देखा गया है। इसके साथ ही, क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की कमी, स्थानीय उद्योगों का अभाव और युवाओं के लिए स्वरोजगार या कौशल विकास की ठोस पहल न होने के कारण युवा वर्ग में निराशा फैली है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं हालांकि नूरपुर में चार डिग्री कॉलेज और 10 इंटर कॉलेज मौजूद हैं, लेकिन संसाधनों की कमी और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सामाजिक दृष्टिकोण से, हिंदू-मुस्लिम वोटबैंक और लगभग 22% दलित आबादी का प्रभाव चुनावी समीकरणों में स्पष्ट रूप से नजर आता है, जिससे सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यक अधिकार और सांप्रदायिक सौहार्द जैसे मुद्दे प्रमुख बने रहे हैं। राजनीतिक दृष्टि से, 2017 में भाजपा विधायक लोकेंद्र चौहान की मृत्यु और 2018 में सपा की उपचुनाव में जीत ने क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता और नेतृत्व परिवर्तन को जन्म दिया। कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में रहे हैं, खासकर जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुई घटनाओं के विरोध में हुए स्थानीय धरना-प्रदर्शनों और भाजपा-कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने स्थानीय प्रशासन की भूमिका को केंद्र में ला दिया है।