पथरदेवा विधानसà¤à¤¾ सीट - Deoria
पथरदेवा |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री सूर्य प्रताप शाही |
| जिला | Deoria |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | देवरिया |
पथरदेवा विधानसभा (देवरिया)
पथरदेवा उत्तर प्रदेश विधानसभा का एक निर्वाचन क्षेत्र है, जो उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में स्थित पथरदेवा नगर को कवर करता है। यह क्षेत्र देवरिया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र की पाँच विधानसभा सीटों में से एक है।
जिला: देवरिया
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 338
लोकसभा क्षेत्र: देवरिया
स्थापना: 2012
जनसंख्या और जनसांख्यिकीय विभाजन (जनगणना 2011)
देवरिया जिला कुल जनसंख्या: 31,00,946
जनसंख्या (2011): सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं
लिंगानुपात: 1,017/1,000
साक्षरता दर: 73.53%
धार्मिक एवं साम्प्रदायिक विभाजन (जनगणना 2011)
हिन्दू : 88.07%
मुस्लिम: 11.56%
ईसाई: 0.12%
सिख: 0.03%
बौद्ध: 0.04%
जैन: 0.01%
अनुसूचित जाति: लगभग 15.7%
अनुसूचित जनजाति: 0.3%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,00,229
विजेता: सूर्य प्रताप शाही (भाजपा)
वोट शेयर: 46.9%
उपविजेता: ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी (सपा)
मतदान प्रतिशत: 59.3%
पथरदेवा विधानसभा सीट, देवरिया जिले की प्रमुख सीटों में से एक है, जहां पिछले दो चुनावों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का वर्चस्व बना हुआ है। इस सीट से भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री सूर्य प्रताप शाही चार बार विधायक रह चुके हैं। 1980 के दशक से सक्रिय शाही 1991 में मंत्री बने थे, हालांकि 2002 के बाद उन्हें लगातार तीन बार हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2017 में उन्होंने शानदार वापसी करते हुए भाजपा की पकड़ मजबूत की। 2012 में समाजवादी पार्टी (सपा) के शाकिर अली ने यहां जीत दर्ज की थी, पर इसके बाद से भाजपा ने लगातार बढ़त बनाए रखी। 2017 और 2022 के चुनावों में सूर्य प्रताप शाही ने क्रमशः सपा के शाकिर अली और ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी को बड़े अंतर से हराया, जबकि बसपा तीसरे स्थान पर रही। 2022 में भाजपा को 46.65% वोट मिले, जबकि सपा को 32.40% और बसपा को 16.73% वोट मिले। क्षेत्रीय जातीय समीकरणों की बात करें तो ब्राह्मण, भूमिहार, यादव, मुस्लिम और दलित मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। भाजपा को ब्राह्मण और सवर्ण मतदाताओं का समर्थन मिलता है, वहीं सपा यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर निर्भर करती है और बसपा का प्रभाव दलित और कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में देखा जाता है। सूर्य प्रताप शाही की व्यक्तिगत साख और राजनीतिक अनुभव भी सीट पर भाजपा की स्थिति को मजबूत बनाए हुए है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
सूर्य प्रताप शाही, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि, कृषि शिक्षा और अनुसंधान विभाग के कैबिनेट मंत्री हैं। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जिला संचालक थे, जबकि चाचा रवींद्र किशोर शाही जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मंत्री रह चुके हैं। शाही ने बीआरडी पीजी कॉलेज, गोरखपुर से बी.ए. और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की। छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने बीएचयू छात्र संघ का चुनाव जीता। वह 1985, 1991 और 1996 में कसया से विधायक रहे, जबकि 2017 और 2022 में पथरदेवा से निर्वाचित हुए। अपने राजनीतिक कॅरियर में उन्होंने गृह राज्य मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, आबकारी मंत्री और कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। चुनावी हलफनामे के अनुसार उनके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक मामला दर्ज नहीं है और उनकी छवि एक स्वच्छ, अनुभवी और प्रभावशाली राजनेता की रही है।
पथरदेवा विधानसभा (देवरिया): पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पथरदेवा विधानसभा (देवरिया) क्षेत्र में पिछले पांच वर्षों के दौरान कई प्रमुख मुद्दे चुनावी बहस और जनचर्चा का केंद्र रहे हैं। स्थानीय विकास और बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा की स्थिति को लेकर जनता में असंतोष बना रहा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जर्जर सड़कें, खराब जल निकासी और सरकारी स्कूलों व अस्पतालों की बदहाली चिंता का विषय रही। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस क्षेत्र में गन्ना, गेहूं, धान और सब्जी की खेती करने वाले किसानों को सिंचाई की कमी, नहरों की सफाई, खाद-बीज की उपलब्धता और फसल के उचित मूल्य जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। बेरोजगारी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अभाव के कारण युवाओं का पलायन भी एक बड़ा मुद्दा बना रहा, जिससे स्वरोजगार और स्थानीय उद्योगों की स्थापना की मांग तेज हुई। जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों की दृष्टि से देखा जाए तो ओबीसी (विशेषकर यादव), मुस्लिम, ब्राह्मण, भूमिहार, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जिससे प्रत्याशी चयन और रणनीति जातिगत संतुलन पर निर्भर करती है। इसके साथ ही, भाजपा और सपा के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में प्रशासनिक पारदर्शिता, निष्पक्ष मतदान, बूथों पर दबाव और ईवीएम से जुड़ी समस्याएं भी चर्चा में रही हैं।