रामपुर कारखाना विधानसभा सीट - Deoria

रामपुर कारखाना

वर्तमान विधायक
श्री सुरेन्द्र चौरसिया
जिला
Deoria
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
देवरिया
रामपुर कारखाना विधानसभा (देवरिया)
रामपुर कारखाना विधानसभा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की एक प्रमुख निर्वाचन क्षेत्र है, जिसकी विधानसभा संख्या 339 है। यह क्षेत्र 2012 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया, इससे पहले इसे गौरीबाजार विधानसभा के नाम से जाना जाता था। रामपुर कारखाना नगर पंचायत, बरियारपुर और भटनी सहित कुल 226 गांव इस विधानसभा क्षेत्र में आते हैं। यह भौगोलिक रूप से छोटी गंडक नदी के किनारे स्थित है और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 339
जिला: देवरिया
आरक्षण: सामान्य
लोकसभा क्षेत्र: देवरिया
रामपुर कारखाना नगर पंचायत जनसंख्या विभाजन (जनगणना 2011)
कुल जनसंख्या (2011): 9,943
पुरुष: 5,095
महिला: 4,848
लिंगानुपात: 952/1,000
साक्षरता दर: 71.6%
अनुसूचित जाति: 7%
अनुसूचित जनजाति: 2.6%
धार्मिक एवं जातीय विभाजन (जनगणना 2011)
हिंदू: 76.56%
मुस्लिम: 23.18%
ईसाई: 0.22%
बौद्ध: 0.02%
धार्मिक एवं साम्प्रदायिक विभाजन (जनगणना 2011)
हिन्दू : 76.56%
मुस्लिम: 23.18%
ईसाई: 0.22%
बौद्ध: 0.02%
अनुसूचित जाति: लगभग  7%
अनुसूचित जनजाति: 2.6%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,05,479
विजेता: सुरेंद्र चौरसिया (भाजपा)
वोट शेयर: 44.2%
उपविजेता: ग़ज़ाला लारी (सपा)
मतदान प्रतिशत: 57.8%
रामपुर कारखाना विधानसभा सीट का गठन 2012 में परिसीमन के बाद हुआ था। पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) की ग़ज़ाला लारी (फसीहा बशीर) ने जीत दर्ज की थी, लेकिन इसके बाद 2017 और 2022 में यह सीट भाजपा के कब्जे में रही। 2017 में भाजपा के कमलेश शुक्ला ने ग़ज़ाला लारी को 9,987 वोटों से हराया, जबकि 2022 में भाजपा के सुरेंद्र चौरसिया ने उन्हें 14,670 वोटों के अंतर से पराजित किया। इन दोनों चुनावों में सपा दूसरे स्थान पर और बसपा तीसरे स्थान पर रही। अब तक सीट पर मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही रहा है, जबकि बसपा और अन्य दलों का प्रभाव सीमित रहा है। भाजपा का वोट शेयर 2017 में 32.69% से बढ़कर 2022 में 43.85% हो गया, वहीं सपा का वोट शेयर 2012 में 29% से बढ़कर 2022 में 36.76% हुआ। जातीय समीकरण में यादव, ब्राह्मण, भूमिहार, मुस्लिम, दलित और ओबीसी मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। भाजपा सवर्ण और ओबीसी वोट बैंक पर निर्भर रही है, जबकि सपा मुस्लिम-यादव समीकरण को साधने की कोशिश करती है। 2022 के चुनाव में कुल मतदान 43.85% रहा और भाजपा के सुरेंद्र चौरसिया ने सपा की ग़ज़ाला लारी को हराया।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
सुरेंद्र चौरसिया, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और रामपुर कारखाना (देवरिया, उत्तर प्रदेश) विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। इनका जन्म कुशहरी, देवरिया में हुआ था और 2022 के अनुसार इनकी उम्र लगभग 39 वर्ष है। वे पेशे से कृषि और व्यवसाय से जुड़े हैं। उनके पिता का नाम सुभाष चौरसिया और पत्नी का नाम अनिता देवी है। सुरेंद्र चौरसिया ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत हिंदु युवा वाहिनी से की थी और 2010 में अपनी पत्नी को जिला पंचायत सदस्य बनवाकर स्थानीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में वे भाजपा से जुड़े और गांव-गांव जनसंपर्क कर पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत की। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें पिछड़ी जाति के युवा चेहरे के रूप में टिकट दिया, जिसमें उन्होंने वोट पाकर सपा की ग़ज़ाला लारी को हराया और पहली बार विधायक बने। चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज हैं।
रामपुर कारखाना विधानसभा (देवरिया): पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में रामपुर कारखाना विधानसभा (देवरिया) क्षेत्र में कई प्रमुख मुद्दे चुनावी बहस और जन असंतोष का केंद्र रहे हैं। सबसे अहम मुद्दा चीनी मिलों की बंदी और गन्ना किसानों की बदहाल स्थिति रही, जो 1990 के दशक में मिलों के बंद होने के बाद से लगातार उठता रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसके अलावा क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर भी जनता में व्यापक असंतोष है। बेरोजगारी और स्थानीय रोजगार के अभाव ने युवाओं को पलायन के लिए मजबूर किया, जिससे स्वरोजगार और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग बढ़ती रही। जातीय और सामाजिक समीकरणों का प्रभाव भी चुनावी रणनीतियों में साफ दिखा, जहां यादव, ब्राह्मण, भूमिहार, मुस्लिम, दलित और ओबीसी समुदायों की भूमिका अहम रही और मुकाबला मुख्यतः भाजपा व सपा के बीच केंद्रित रहा। इसके साथ ही क्षेत्रीय विधायक की जनता से दूरी और उनके परिजनों के हस्तक्षेप ने न केवल आम लोगों में नाराजगी पैदा की बल्कि भाजपा संगठन के भीतर भी असंतोष और नेतृत्व पर सवाल खड़े किए।

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