सहारनपुर विधानसभा सीट - Saharanpur

सहारनपुर

वर्तमान विधायक
श्री आशु मलिक
जिला
Saharanpur
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
समाजवादी पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
सहारनपुर
सहारनपुर विधानसभा क्षेत्र, जो जिले की अहम सीटों में से एक है, का पहला चुनाव 2012 में हुआ था। शुरुआत में यह सीट बसपा के खाते में गई जब जगपाल सिंह ने जीत दर्ज की, जबकि 2017 में कांग्रेस के मसूद अख्तर ने यहां जीत हासिल की। इस क्षेत्र की राजनीति में कांग्रेस, बसपा, भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) चारों दल सक्रिय रहे हैं, लेकिन चुनावी समीकरण जातीय और धार्मिक आधार पर अधिक प्रभावित होते रहे हैं। 2022 में यहां बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब सपा के आशु मलिक ने भाजपा उम्मीदवार जगपाल सिंह को 30,745 वोटों के अंतर से हराकर सीट पर कब्जा जमाया। आशु मलिक को कुल 41.3% वोट मिले, जबकि भाजपा को 29.35% वोट और बसपा को 24.10% वोट मिले। इस नतीजे ने साफ कर दिया कि सपा ने सहारनपुर विधानसभा में अपनी स्थिति और मज़बूत कर ली है। कुल मिलाकर, यहां की राजनीति विकास कार्यों, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दों पर टिकी रहती है, जहाँ भाजपा और बसपा की उपस्थिति तो है, लेकिन फिलहाल सपा का पलड़ा भारी है।
कुल मतदाता: 2,58,932
विजेता: आसु मलिक (सपा)
वोट शेयर: 41.3%
उपविजेता: जगपाल सिंह (भाजपा)
मतदान प्रतिशत: 72.4%
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
आशु मलिक समाजवादी पार्टी के नेता और वर्तमान में सहारनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। लगभग 40 वर्षीय आशु मलिक की शैक्षिक योग्यता 10वीं है और वे व्यवसाय, पेंशन तथा किराये से जुड़े कामकाज करते हैं। राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका पहले भी रही है, वे विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं और सहारनपुर देहात से सपा के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। पार्टी के भीतर वे उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनकी वजह से कभी सपा में खींचतान की स्थिति बनी थी। उनका परिवार और खुद उनका क्षेत्र में अच्छा राजनीतिक प्रभाव माना जाता है। उनके चुनावी हलफनामे के अनुसार उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है और उन्हें एक साफ-सुथरी छवि वाला राजनेता माना जाता है।
सहारनपुर विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में सहारनपुर विधानसभा क्षेत्र में जनता की ज़िंदगी कई अहम मुद्दों से प्रभावित रही है। सबसे बड़ी समस्या जर्जर सड़कों और अधूरे बुनियादी ढांचे की रही, जिसने रोज़मर्रा के जीवन को मुश्किल बनाया। कृषि प्रधान इलाका होने के कारण किसानों ने बकाया भुगतान, सिंचाई की सुविधाएँ और गन्ना मूल्य जैसे मुद्दों पर लगातार आवाज़ उठाई। यहाँ की राजनीति जातीय समीकरणों पर भी टिकी रही, जहाँ मुस्लिम, दलित, ठाकुर, कश्यप, ब्राह्मण, सैनी और यादव जैसी जातियाँ चुनावी रणनीति का केंद्र बनीं। इस दौरान बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव लगभग खत्म हो गया, जबकि भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली। चुनावों के वक्त ईवीएम की खराबी, सुरक्षा व्यवस्था और मतदान की पारदर्शिता भी चर्चा में रहीं। मुस्लिम और दलित आबादी ज़्यादा होने के कारण सामाजिक सौहार्द बनाए रखना भी हमेशा चुनौती रहा। इसके साथ ही सरकारी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में सुविधाओं की कमी ने जनता को निराश किया। कुल मिलाकर, सहारनपुर विधानसभा की राजनीति और जनजीवन विकास, रोज़गार, जातीय संतुलन और सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता रहा।

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