सैयदराजा विधानसà¤à¤¾ सीट - Chandauli
सैयदराजा |
|
|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री सुशील सिंह |
| जिला | Chandauli |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | चंदौली |
सैयदराजा विधानसभा सीट
सैयदराजा विधानसभा सीट यूपी की कुल 403 असेंबली सीटों में से एक है। सैयदराजा विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित है और राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से एक है। इसका नाम पहले चंदौली सदर था। 2012 में परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर सैयदराजा कर दिया गया और यह सामान्य (अनारक्षित) सीट हो गई. पूर्वांचल के चंदौली जिले के तहत आने वाली इस विधानसभा सीट के तमाम गांव बिहार सीमा से सटे हुए हैं। यहां कर्मनाशा नदी यूपी और बिहार को बांटती है। फिलहाल यहां से पूर्वांचल के चर्चित माफिया डॉन ब्रजेश सिंह के भतीजे सुशील कुमार सिंह बीजेपी से विधायक हैं। यह सीट बाहुबलियों की राजनीतिक टक्कर का भी गवाह रहा है। सैयदराजा विधानसभा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है, जहां धान और गेहूं प्रमुख फसलें हैं। यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश के 'धान का कटोरा' के रूप में प्रसिद्ध है। हालांकि, विकास के मामले में चंदौली ज़िला अभी भी पिछड़ा हुआ माना जाता है और भारत सरकार द्वारा घोषित देश के 250 सबसे पिछड़े ज़िलों में शामिल है, जिसे बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड के अंतर्गत विशेष सहायता प्रदान की जाती है।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 382
ज़िला: चंदौली
लोकसभा क्षेत्र: चंदौली
आरक्षण स्थिति: सामान्य
सैयदराजा नगर पंचायत (2011 की जनगणना)
कुल जनसंख्या: 18,315
पुरुष: 9,624
महिला: 8,691
लिंगानुपात: 903/1,000
साक्षरता दर: 71.48%
धार्मिक और सामुदायिक विभाजन (2011 की जनगणना)
हिंदू: 88.48%
मुस्लिम: 11.01%
ईसाई: 0.11%
सिख: 0.07%
बौद्ध: 0.02%
जैन: 0.01%
अन्य: 0.25%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,08,384
विजेता: सुशील कुमार सिंह (भाजपा)
वोट शेयर: 42.2%
उपविजेता: मनोज कुमार (सपा)
मतदान प्रतिशत: 61.2%
सैयदराजा विधानसभा सीट, जो 2012 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई, बाहुबलियों की राजनीति का केंद्र रही है। यहां 1952 में पहले चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी चंदौली सदर से विधायक चुने गए थे, जिसे बाद में आरक्षित घोषित कर दिया गया। सैयदराजा सीट पर माफिया डॉन बृजेश सिंह और उनके परिवार का खासा प्रभाव रहा है। 2012 में बृजेश सिंह ने जेल से चुनाव लड़ा, लेकिन निर्दलीय मनोज कुमार सिंह (डब्लू) ने जीत हासिल की। 2017 और 2022 में बीजेपी से बृजेश सिंह के भतीजे सुशील कुमार सिंह विजयी रहे। 2022 में हुए त्रिकोणीय मुकाबले में उन्होंने सपा के मनोज कुमार को लगभग 11,000 वोटों से हराया, जबकि बसपा और कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा। प्रमुख राजनीतिक चेहरे जैसे सुशील कुमार सिंह (बीजेपी), मनोज कुमार सिंह (सपा), विनीत सिंह (बसपा) और बृजेश सिंह (निर्दलीय माफिया प्रत्याशी) इस सीट की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। जातीय समीकरण विशेषकर राजपूत, यादव और दलित वोटों का बंटवारा, यहां चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है, वहीं बिहार सीमा से सटे होने के कारण क्षेत्रीय राजनीति का भी असर दिखता है। हालिया चुनावों में बीजेपी का वर्चस्व कायम रहा है, जबकि सपा और बसपा के बीच मतों के बंटवारे से बीजेपी को लाभ मिला है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
सुशील कुमार सिंह, भारतीय जनता पार्टी के नेता, पूर्वांचल की राजनीति में एक प्रभावशाली चेहरा हैं। वे एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। पिता उदय नाथ सिंह पूर्व विधान परिषद सदस्य रहे हैं, जबकि उनके चाचा बृजेश सिंह एक चर्चित बाहुबली हैं। सुशील सिंह की पत्नी किरण सिंह पूर्व वाराणसी जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। राजनीति में उन्होंने 2002 में बसपा के टिकट पर धानापुर से कदम रखा, हालांकि मात्र 26 वोटों से हार गए। 2007 में बसपा से ही विधायक बने, फिर 2012 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सकलडीहा से विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 2017 और 2022 में भाजपा के टिकट पर सैयदराजा से लगातार जीत हासिल की, जिससे वे चंदौली जिले से चार बार लगातार विधायक बनने वाले पहले नेता बन गए। राजनीति में आने से पहले वे सरकारी ठेकेदारी के व्यवसाय से जुड़े थे। सुशील सिंह की छवि उनके बाहुबली चाचा के कारण चर्चा में रही है। 2022 चुनावी हलफनामे के अनुसार उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज है।
सैयदराजा विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में सैयदराजा विधानसभा क्षेत्र में कई प्रमुख समस्याएं उभरकर सामने आई हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि प्रधान और ग्रामीण है, जहां किसानों के लिए नहरों में टेल तक पानी न पहुंचने की समस्या गंभीर रूप से सिंचाई को प्रभावित करती है। सड़क और कनेक्टिविटी की हालत भी खराब है। जर्जर ग्रामीण सड़कों और यूपी-बिहार बॉर्डर के नौबतपुर क्षेत्र में जाम की समस्या आम हो गई है। उच्च शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं, विशेषकर B.Sc. जैसे कोर्स के लिए, उपलब्ध न होने से युवाओं को बाहर जाना पड़ता है। चुनावी समीकरणों में जातीय फैक्टर और बाहुबलियों का प्रभाव भी निर्णायक रहा है, जिससे विकास के मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, रोजगार के अवसरों की कमी और बढ़ते पलायन ने बेरोजगारी की समस्या को और गहरा किया है। वहीं, यूपी-बिहार सीमा पर होने के कारण अपराध, तस्करी और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां भी बनी रहती हैं। क्षेत्र में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी आधारभूत सुविधाओं के विकास की मांग लगातार उठती रही है, लेकिन अपेक्षित प्रगति अब तक नहीं हो सकी है।