सलेमपुर विधानसà¤à¤¾ सीट - Deoria
सलेमपुर |
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|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्रीमती विजयलक्ष्मी गौतम |
| जिला | Deoria |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | सलेमपुर |
सलेमपुर विधानसभा
सलेमपुर विधानसभा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की एक महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र है, जिसकी विधानसभा संख्या 341 है। यह सीट सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्र के साथ कुछ नगर पंचायतों को भी शामिल करती है। देवरिया जिले में कुल 7 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें सलेमपुर प्रमुख है। ऐतिहासिक रूप से यह सीट कभी कांग्रेस का गढ़ मानी जाती थी, लेकिन 1990 के बाद से यहां भाजपा, सपा, बसपा और अन्य दलों के बीच मुकाबला देखने को मिलता है।
विधानसभा क्षेत्र: सलेमपुर विधानसभा
जिला: देवरिया (आंशिक), साथ में बलिया जिले के कुछ हिस्से
लोकसभा क्षेत्र: सलेमपुर (71)
आरक्षण: अनुसूचित जाति
जनसंख्या विभाजन (जनगणना 2011)
सलेमपुर कुल जनसंख्या (2011): 6,04,483
पुरुष: 2,98,212
महिला: 3,06,271
लिंगानुपात: 1,027/1,000
साक्षरता दर: 73.43%
धार्मिक एवं जातीय विभाजन
हिंदू: 88-92%
मुस्लिम: 7-11%
अन्य: 1% से कम
अनुसूचित जाति: 15.5%
अनुसूचित जनजाति: 3.8%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 1,75,977
विजेता: विजय लक्ष्मी गौतम (भाजपा)
वोट शेयर: 46.6%
उपविजेता: मनबोध प्रसाद (सुभासपा/सपा गठबंधन)
मतदान प्रतिशत: 51.6%
सलेमपुर विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास कभी कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टियों के मजबूत गढ़ के रूप में जाना जाता था। हालांकि, 1980 में भाजपा ने पहली बार यहां उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन इसके बाद करीब 37 वर्षों तक वह तीसरे स्थान पर बनी रही। 1990 के बाद मंडल-कमंडल की राजनीति के प्रभाव से कांग्रेस धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई और जनता दल, सपा तथा बसपा का प्रभाव बढ़ता गया। भाजपा का उदय 2017 में मोदी लहर के साथ हुआ, जब पार्टी ने पहली बार यह सीट जीती और 2022 में भी विजय दर्ज कर लगातार दूसरी बार सलेमपुर को अपने पक्ष में किया, जिससे यह सीट भाजपा के लिए मजबूत मानी जाने लगी। वर्तमान में बसपा और कांग्रेस का प्रभाव काफी कम हो चुका है कांग्रेस तो चुनावी दौड़ में कहीं नज़र नहीं आती, जबकि बसपा भी कमजोर पड़ चुकी है। 2022 के चुनाव में भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला, जिसमें बसपा और कांग्रेस हाशिए पर रहीं। जातीय समीकरण के लिहाज से सलेमपुर में गैर-यादव ओबीसी, सामान्य, दलित, मुस्लिम और यादव समुदायों का लगभग समान वितरण है, जिसमें भाजपा को सामान्य, गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं का समर्थन मिला, जबकि सपा ने यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर भरोसा किया। भाजपा प्रत्याशी विजय लक्ष्मी गौतम को एक महिला और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मिली लोकप्रियता ने उन्हें सभी वर्गों का समर्थन दिलाने में मदद की।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
विजय लक्ष्मी गौतम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेता हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री के पद पर कार्यरत हैं। वे देवरिया जिले की सलेमपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं और 2022 में पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचीं। 1996 से भाजपा में सक्रिय राजनीति कर रहीं विजय लक्ष्मी गौतम की पहचान एक संघर्षशील और जमीनी महिला नेता के रूप में रही है। वे पूर्वांचल की दलित पृष्ठभूमि से आती हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी के चलते उन्हें क्षेत्र में महिला नेतृत्वकर्ता के रूप में विशेष पहचान मिली है। 2022 के चुनाव में सलेमपुर से जीत दर्ज कर उन्होंने मंत्री पद हासिल किया, जो उनकी राजनीतिक यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि है। चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज है।
सलेमपुर विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में सलेमपुर विधानसभा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दे लगातार चुनावी बहस और जन असंतोष का केंद्र बने रहे। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में सड़क, बिजली और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने जनता को सबसे अधिक प्रभावित किया, जहां जर्जर सड़कें, बिजली कटौती और पानी की अनुपलब्धता प्रमुख समस्याएं रहीं। कृषि क्षेत्र, विशेष रूप से गन्ना किसानों की हालत भी चिंता का विषय बनी रही, क्योंकि क्षेत्र में पहले सक्रिय रही चीनी मिलों के बंद होने से किसानों को न तो उचित मूल्य मिल पाया और न ही उपयुक्त बाजार, जिससे उन्होंने धीरे-धीरे गन्ना खेती से दूरी बना ली। बेरोजगारी, खासकर शिक्षित युवाओं के बीच, एक गंभीर मुद्दा रहा, और स्वरोजगार, सरकारी नौकरियों व छोटे उद्योगों की मांग लगातार उठती रही। कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर भी चिंताएं बनी रहीं, जिसमें आपराधिक तत्वों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक शांति अब भी एक मुद्दा बनी रही। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी सवालों के घेरे में रही सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में संसाधनों की कमी, डॉक्टरों की अनुपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण सुविधाओं की मांग लगातार उठती रही।