शिकारपुर विधानसभा सीट - Bulandshahr

शिकारपुर

वर्तमान विधायक
श्री अनिल कुमार
जिला
Bulandshahr
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
बुलंदशहर
शिकारपुर विधानसभा सीट
शिकारपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र, उत्तर प्रदेश विधान सभा के 403 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। यह बुलंदशहर जिले में स्थित है और बुलंदशहर लोकसभा क्षेत्र की पाँच विधानसभा सीटों में शामिल है। इस क्षेत्र में पहला चुनाव 1957 में संपन्न हुआ, जो 1956 में पारित 'डीपीएसीओ (1956)' यानी परिसीमन आदेश के तहत हुआ था। वर्ष 2008 में 'संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदेश' लागू होने के बाद इसे विधानसभा क्षेत्र संख्या 69 के रूप में अधिसूचित किया गया। यह निर्वाचन क्षेत्र 1967 से 1973 के बीच अस्तित्व में नहीं था। वर्ष 1957 में, यहां दो विधायक एक साथ चुने गए थे और यह सीट अनुसूचित जाति (एससी) के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थी, यह आरक्षण 2008 तक प्रभावी रहा।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 69
जिला: बुलंदशहर
लोकसभा क्षेत्र: बुलंदशहर
आरक्षण स्थिति: नहीं
कुल जनसंख्या: 4,35,048
साक्षरता दर: 67.99%
धार्मिक और जातीय विभाजन (तहसील, जनगणना 2011)
मुस्लिम: 16.33%
हिन्दू: 83.36%
ईसाई: 0.08%
सिख: 0.07%
जैन: 0.04%
बौद्ध: 0.01%
अनुसूचित जाति: 26.2%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,18,301
विजेता: अनिल शर्मा (भाजपा)
वोट शेयर: 58.9%
उपविजेता: हरीश कुमार (सपा)
मतदान प्रतिशत: 62.9%
शिकारपुर विधानसभा क्षेत्र, बुलंदशहर जिले की एक ब्राह्मण बहुल सीट है, जहां जाट, दलित और मुस्लिम मतदाताओं की भी बड़ी हिस्सेदारी है। इस सीट का राजनीतिक इतिहास काफी विविध रहा है, क्योंकि यहां किसी एक पार्टी का लंबे समय तक स्थायी वर्चस्व नहीं रहा। 1970 के बाद से कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, बसपा और सपा सभी दलों ने यहां जीत दर्ज की है, जो इस क्षेत्र में दल-बदल और राजनीतिक उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। हालांकि 1990 के बाद से भाजपा ने यहां पाँच बार जीत हासिल कर अपनी मजबूत स्थिति बनाई है। महत्वपूर्ण विजेताओं में धर्म सिंह (कांग्रेस, 1974 और 1980), त्रिलोकचंद (जनता पार्टी और लोकदल), गंगाराम (जनता दल), रामप्रसाद (भाजपा, 1991-93), मुंशी लाल गौतम (भाजपा, 2002), वासुदेव सिंह (बसपा, 2007), मुकेश शर्मा (सपा, 2012) और अनिल शर्मा (भाजपा, 2017, 2022) शामिल हैं। हालिया चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा 2022 में अनिल शर्मा ने 53.04% पाकर रालोद और बसपा को भारी अंतर से हराया, जबकि 2017 में भी उन्होंने 50% से अधिक वोटों के साथ जीत दर्ज की थी। इसके विपरीत 2012 में सपा और 2007 में बसपा को सफलता मिली थी, जो इस क्षेत्र को बहुकोणीय मुकाबले वाला बनाता है। जातीय समीकरण यहां की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, विशेषकर ब्राह्मण, जाट, दलित और मुस्लिम समुदायों का वोट व्यवहार। चुनावों में कृषि, सिंचाई, बेरोजगारी, ग्रामीण विकास और बुनियादी सुविधाएं प्रमुख मुद्दे रहते हैं। साथ ही, मतदाताओं की बार-बार दल और प्रत्याशी बदलने की प्रवृत्ति ने इसे किसी एक दल का स्थायी गढ़ बनने से रोके रखा है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
अनिल शर्मा, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और शिकारपुर (बुलंदशहर) विधानसभा क्षेत्र के विधायक हैं। उनका जन्म शिकारपुर तहसील के सुरजावली गाँव में हुआ और उन्होंने जेपी इंटर कॉलेज, बुलंदशहर से इंटरमीडिएट तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वे एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके दादा लक्ष्मी चंद शर्मा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं। अनिल शर्मा का राजनीतिक सफर 1989 में शुरू हुआ जब वे सुरजावली गाँव के निर्विरोध प्रधान चुने गए। इसके बाद उन्होंने 2002 और 2007 में खुर्जा से बसपा विधायक के रूप में जीत दर्ज की। खुर्जा सीट के सुरक्षित होने के बाद उन्होंने शिकारपुर से चुनाव लड़ा। 2012 में बसपा प्रत्याशी के रूप में हार का सामना करने के बाद वे 2017 में भाजपा में शामिल हुए और शिकारपुर से विधायक चुने गए। 2022 में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के रूप में चौथी बार विधानसभा में प्रवेश किया और 55,683 मतों के रिकॉर्ड अंतर से जीत दर्ज की। योगी आदित्यनाथ सरकार में वे वन एवं पर्यावरण मंत्री भी रह चुके हैं। चुनावी हलफनामों के अनुसार उनके खिलाफ दो आपराधिक मामला दर्ज है।
शिकारपुर विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में शिकारपुर विधानसभा क्षेत्र में कई प्रमुख स्थानीय मुद्दे जनता की चिंता का केंद्र बने रहे। बुनियादी विकास और ग्रामीण अवसंरचना जैसे सड़कों की मरम्मत, जल निकासी, पेयजल आपूर्ति, सीवर व्यवस्था और सफाई को लेकर क्षेत्रवासी असंतुष्ट रहे। यह क्षेत्र कृषि प्रधान होने के कारण किसानों को सिंचाई, खाद-बीज की उपलब्धता, फसलों का उचित मूल्य और समय पर भुगतान जैसे समस्याओं का सामना करना पड़ा, विशेषकर गन्ना और गेहूं उत्पादक किसानों की मांगें प्रमुख रहीं। बेरोजगारी भी एक बड़ा मुद्दा रहा, जहां युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों की कमी, तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए संसाधनों के अभाव से जूझना पड़ा। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति कमजोर बनी रही, जिसमें शिक्षकों और डॉक्टरों की कमी, तथा ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच का अभाव प्रमुख समस्या रही। कानून-व्यवस्था को लेकर भी चिंता बनी रही. महिलाओं की सुरक्षा, भूमि विवाद और पुलिस की निष्क्रियता स्थानीय जन विमर्श में लगातार शामिल रहे। इसके अतिरिक्त, ब्राह्मण, जाट, दलित और मुस्लिम समुदायों की निर्णायक भूमिका, जातीय समीकरण और सांप्रदायिक सौहार्द भी क्षेत्र की चुनावी और सामाजिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण विषय बने रहे।

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