सिकन्दरपुर विधानसभा सीट - Ballia

सिकन्दरपुर

वर्तमान विधायक
श्री जियाउद्दीन रिजवी
जिला
Ballia
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
समाजवादी पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
सलेमपुर
सिकंदरपुर विधानसभा सीट
सिकंदरपुर विधानसभा सीट (संख्या 359) उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की एक महत्वपूर्ण सीट है। यह सिकंदरपुर नगर पंचायत और इसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करती है। यह सीट सामान्य (अनारक्षित) श्रेणी में आती है और सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत पाँच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। यह क्षेत्र सामाजिक रूप से विविध है और यहाँ हमेशा बहुकोणीय चुनावी मुकाबले होते रहे हैं, जिनमें समाजवादी पार्टी (सपा), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख दावेदार रहे हैं।
जनसंख्या
कुल मतदाता (2022): 3,07,974
अनुमानित नगर जनसंख्या (2024): 33,800 (सिकंदरपुर नगर पंचायत)
2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या: 23,986 (सिकंदरपुर नगर)
लिंग अनुपात (नगर): 917/1000
साक्षरता दर: 77.08%
पुरुष: 83.70%,
महिला: 69.88%
धार्मिक और सामाजिक विभाजन (सिकंदरपुर नगर, 2011)
हिंदू: 64.08%
मुस्लिम: 35.77%
ईसाई:  0.10%
अन्य: 0.1%
अनुसूचित जाति: 13.70%
अनुसूचित जनजाति: 2.43%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 के चुनाव परिणाम
विजेता: जियाउद्दीन रिज़वी (सपा)
वोट शेयर: 42.75%
उपविजेता: संजय यादव (भाजपा)
सिकंदरपुर विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। शुरुआत में इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा था, जिसने 1962 में पहला चुनाव जीता और कुल चार बार जीत दर्ज की, आखिरी बार 1991 में मार्कंडेय के नेतृत्व में। 1993 में सपा के दीनानाथ चौधरी ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली, जिसके बाद सपा और बसपा का युग शुरू हुआ। 2002 और 2012 में सपा के जियाउद्दीन रिज़वी ने जीत हासिल की, जबकि 2007 में यह सीट बसपा के पास चली गई। 2017 में भाजपा ने पहली बार संजय यादव के नेतृत्व में बड़ी जीत दर्ज की, जब उन्होंने सपा के जियाउद्दीन रिज़वी को 23,548 वोटों के भारी अंतर से हराया। 2022 में मुकाबला सपा और भाजपा के बीच सीधे तौर पर हुआ, जिसमें सपा ने भाजपा से सीट वापस हासिल कर ली और बसपा तीसरे स्थान पर रही। परंपरागत रूप से यह सीट सपा-बसपा के बीच सिमटी रहती थी, लेकिन अब भाजपा भी एक मजबूत चुनौती के रूप में उभर चुकी है।
विधायक परिचय एवं आपराधिक रिकॉर्ड
मोहम्मद जियाउद्दीन रिज़वी, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता, उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिवानकला गांव में 1 जनवरी 1959 को जन्मे। उन्होंने 1986 में दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से कला स्नातक (BA) की डिग्री प्राप्त की। वे तीन बार सिकंदरपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए हैं। पहली बार 2002 में, दूसरी बार 2012 में जब वे अखिलेश यादव सरकार में पंचायती राज मंत्री भी बने, और तीसरी बार 2022 में, जब उन्होंने भाजपा के संजय यादव को 11,855 वोटों से हराया। उनकी पहचान मुस्लिम-यादव गठजोड़ के मजबूत प्रतिनिधि और स्थानीय मुद्दों, विशेष रूप से गुलाब उद्योग के संरक्षण के लिए सक्रिय नेता के रूप में रही है। निजी जीवन में वे आयशा रिज़वी के पति हैं और तीन संतानों के पिता हैं। उनके खिलाफ 2022 के शपथपत्र के अनुसार तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं, जो मुख्य रूप से राजनीतिक या चुनावी गतिविधियों से जुड़े हैं जिनमें पार्टी के युवा नेता को धमकाने वाला ऑडियो वायरल होना और चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा समर्थकों को सरकारी योजनाओं से वंचित रखने संबंधी बयान शामिल हैं। हालांकि, उन पर कोई गंभीर आपराधिक आरोप नहीं है। क्षेत्रीय विकास, गुलाब उद्योग के पुनरुद्धार और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रिय भूमिका उन्हें क्षेत्र में एक प्रभावशाली नेता बनाती है।
सिकंदरपुर विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पाँच वर्षों में सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र में कई गंभीर मुद्दे सामने आए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है रेलमार्ग से अब तक न जुड़ पाना, जिससे व्यापार, यातायात और स्थानीय जनजीवन प्रभावित हो रहा है। सड़कें जर्जर हैं, पुलों की कमी से ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क बाधित रहता है। कृषि क्षेत्र भी संकट में है गुलाब की खेती, जो कभी सिकंदरपुर की पहचान थी, अब लगभग समाप्ति पर है और किसानों को वैकल्पिक फसल व बाजार की कमी झेलनी पड़ रही है। सिंचाई, खाद-बीज और उचित फसल मूल्य की समस्याएँ लगातार बनी हुई हैं। सरकारी योजनाओं का सही लाभ न मिल पाना, खासकर दलित और पिछड़े वर्गों के लिए, चिंता का विषय है। कस्बे में पेयजल, सफाई, जलनिकासी और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी बुनियादी समस्याएँ बनी हुई हैं। शिक्षा क्षेत्र में शिक्षकों की कमी, स्कूलों की जर्जर स्थिति और उच्च शिक्षा संस्थानों की अनुपलब्धता ने हालात और बिगाड़े हैं। रोजगार की कमी के कारण युवाओं का पलायन बढ़ा है। इसके साथ ही, विकास कार्यों की धीमी गति और राजनीतिक अस्थिरता ने योजनाओं के स्थायी लाभ को रोक दिया है, जिससे जनता में निराशा का माहौल है।

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