सिकन्दरा राऊ विधानसà¤à¤¾ सीट - Hathras
सिकन्दरा राऊ |
|
|---|---|
| वर्तमान विधायक | श्री बीरेन्द्र सिंह राणा |
| जिला | Hathras |
| राज्य | उत्तर प्रदेश |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| कुल मतदाता | |
| लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र | हाथरस |
सिकंदराराऊ विधानसभा सीट
सिकंदराराऊ विधानसभा उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले की एक प्रमुख विधानसभा सीट है, जिसे 1952 में पहली बार अस्तित्व मिला। यह सीट सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से विविध है और हाथरस लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। विधानसभा क्रमांक 80 है और यह सामान्य वर्ग (गैर-आरक्षित) सीट है। सिकंदराराऊ नगर पालिका क्षेत्र बड़ा कस्बाई केंद्र है, जो कृषि, व्यापारिक गतिविधियों और धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है।
जनसंख्या (जनगणना 2011)
जिला: हाथरस
विधानसभा क्रमांक: 80
लोकसभा क्षेत्र: हाथरस
आरक्षण: कोई नहीं (सामान्य)
अनुमानित आबादी: लगभग 4,04,567
साक्षरता दर: 67.07%
लिंग अनुपात: 876/1000
धार्मिक और सामाजिक विभाजन
हिंदू: 53.89%
मुस्लिम: 45.26%
अन्य समुदाय: 0.85%
अनुसूचित जाति: 16.9%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,34,441
विजेता: वीरेंद्र सिंह राणा (भाजपा)
वोट शेयर: 41.8%
उपविजेता: डॉ. ललित प्रताप बघेल (सपा)
मतदान प्रतिशत: 62.3%
सिकंदराराऊ विधानसभा सीट, उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले की एक अहम राजनीतिक सीट है, जहां क्षत्रिय मतदाताओं का खासा प्रभाव देखा जाता है। इस क्षेत्र में पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और योग्यता को महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि अब तक हुए 17 चुनावों में सबसे ज्यादा चार बार निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। कांग्रेस और बीजेपी को तीन-तीन बार, जबकि सपा और बसपा को एक-एक बार सफलता मिली है। 1952 में कांग्रेस के नेकराम शर्मा पहले विधायक बने थे, जो बाद में निर्दलीय भी जीते। 1991 के बाद से कोई भी पार्टी इस सीट पर लगातार नहीं जीत सकी है, लेकिन भाजपा ने 1996, 2007 और 2017 में जीत हासिल की, वहीं 2012 में बसपा के रामवीर उपाध्याय ने बाज़ी मारी और मायावती सरकार में मंत्री बने। क्षेत्र में ठाकुर, यादव, ब्राह्मण, बघेल, मुस्लिम और अनुसूचित जाति के मतदाताओं की विविधता चुनावी समीकरणों को लगातार बदलती रही है। हाल के वर्षों में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है. 2022 के चुनाव में बीजेपी के बीरेंद्र सिंह राणा ने सपा के डॉ. ललित प्रताप बघेल और बसपा के अवधेश कुमार सिंह को हराकर सीट बरकरार रखी, उन्हें लगभग 41.5% वोट मिले और जीत का अंतर करीब 8,104 वोट रहा। करीब 60% मतदान हुआ था। कुल मिलाकर, सिकंदराराऊ सीट का चुनावी इतिहास व्यक्तिगत छवि, जातीय समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के बीच संतुलन बनाते हुए लगातार बदलते राजनीतिक रुझानों को दर्शाता है, जहां फिलहाल भाजपा का वर्चस्व कायम है।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
वीरेंद्र सिंह राणा, एक जमीन से जुड़े और साफ-सुथरी छवि वाले नेता माने जाते हैं। अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव और सादाबाद इंटर कॉलेज से पूरी करने के बाद वे 1976 से 1996 तक छत्तीसगढ़ की एक शराब फैक्ट्री में मैनेजर के पद पर कार्यरत रहे। वहीं रहते हुए वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और वनवासी कल्याण समिति से भी सक्रिय रूप से जुड़ गए। 1996 में हाथरस लौटने के बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा और पार्टी में जिलाध्यक्ष जैसे अहम पदों पर काम किया। 2017 में भाजपा के टिकट पर सिकंदराराऊ विधानसभा से चुनाव जीतकर वे विधायक बने और तब से क्षेत्र के विकास कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर वे इंट्रालॉकिंग सड़कों, स्कूलों, पॉलिटेक्निक कॉलेज और स्टेडियम जैसे कई परियोजनाओं के निर्माण का दावा करते हैं। क्षेत्र में उनका प्रभाव खास तौर पर क्षत्रिय, यादव, ब्राह्मण, मुस्लिम और अन्य समुदायों के बीच देखा जाता है। 2022 चुनावी हलफनामे के अनुसार वीरेंद्र सिंह राणा के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
सिकंदराराऊ विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में सिकंदराराऊ विधानसभा क्षेत्र ने कई अहम स्थानीय चुनौतियों का सामना किया है, जो यहां की राजनीति और विकास की दिशा तय करते रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या और सुविधाएं दोनों ही नाकाफी रहीं, जिससे लोगों को इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ा। शिक्षा के मोर्चे पर भी हालात बेहतर नहीं रहे, सरकारी स्कूलों की स्थिति कमजोर है और उच्च शिक्षा के संसाधनों की कमी छात्रों के लिए बड़ी बाधा बनी रही, खासकर बालिकाओं की शिक्षा को लेकर चिंता बनी रही। सड़क और परिवहन व्यवस्था भी उपेक्षित रही, कई गांवों में अब भी पक्के रास्तों की कमी है और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अव्यवस्थित है, जिससे किसानों और युवाओं को खासी परेशानी होती है। कृषि प्रधान इस क्षेत्र में जल आपूर्ति और सिंचाई की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रही, नहरों और ट्यूबवेलों में पानी की उपलब्धता सीमित रही और पीने के पानी की व्यवस्था भी ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बनी रही। बेरोजगारी और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार या उद्योगों की कमी के चलते युवा पलायन एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा। इसके अलावा, जाट, यादव, मुस्लिम जैसे समुदायों के बीच संतुलन और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना भी राजनीतिक चुनौती बना रहा। महिला सुरक्षा, बालिका शिक्षा और बाल विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी लगातार जागरूकता और ठोस कदमों की मांग उठती रही। कुल मिलाकर, ये सारे मुद्दे मतदाताओं की अपेक्षाओं और चुनावी बहसों का केंद्र बने रहे हैं, जिनका समाधान अब भी क्षेत्र के समग्र विकास के लिए जरूरी है।