स्याना विधानसभा सीट - Bulandshahr

स्याना

वर्तमान विधायक
श्री देवेन्द्र सिंह लोधी
जिला
Bulandshahr
राज्य
उत्तर प्रदेश
पार्टी
भारतीय जनता पार्टी
कुल मतदाता
लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र
बुलंदशहर
स्याना विधानसभा सीट
स्याना विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र भारत के उत्तर प्रदेश विधान सभा के 403 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। यह बुलंदशहर जिले का एक हिस्सा है और बुलंदशहर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के पाँच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। इस विधानसभा क्षेत्र में पहला चुनाव 1957 में हुआ था, जब 1956 में 'डीपीएसीओ (1956)' (परिसीमन आदेश) पारित किया गया था। 2008 में 'संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदेश' पारित होने के बाद, इस सीट को पहचान संख्या 66 सौंपी गई।
विधानसभा क्षेत्र संख्या: 66
जिला: बुलंदशहर
लोकसभा क्षेत्र: बुलंदशहर
आवृत क्षेत्र: संपूर्ण स्याना तहसील
आरक्षण: सामान्य
धार्मिक और जातीय विभाजन (जनगणना 2011)
मुस्लिम: 68.50%
हिन्दू: 30.98%
ईसाई: 0.44%
सिख: 0.01%
बौद्ध: 0.02%
अनुसूचित जाति: 18.56%
अनुसूचित जनजाति: 0.01%
राजनीतिक इतिहास और हालिया चुनावी रुझान
2022 चुनावी परिणाम
कुल मतदाता: 2,51,795
विजेता: देवेंद्र सिंह लोधी (भाजपा)
वोट शेयर: 59.2%
उपविजेता: दिलनवाज़ ख़ान (रालोद)
मतदान प्रतिशत: 65.4%
स्याना विधानसभा सीट की स्थापना 1957 में हुई थी और यह बुलंदशहर जिले की एक प्रमुख सीट है, जो बुलंदशहर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा भी है। शुरुआत में यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा, जहां 1980 और 1990 के दशकों तक पार्टी ने प्रभावी प्रदर्शन किया और 15 चुनावों में से 6 बार जीत दर्ज की, जिसमें कई बार एक ही परिवार के सदस्य विधायक बने। 1977 और 1980 में जनता पार्टी और जनता पार्टी (सेक्युलर) को सफलता मिली, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) कभी यह सीट नहीं जीत सकीं। 1991 के बाद भाजपा ने इस क्षेत्र में मजबूती से पैर जमाए और 1991, 1993, 2007, 2017 और 2022 में सीट पर कब्जा किया। हालांकि, 2002 में कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी ने जीत दर्ज की थी। जातीय दृष्टिकोण से स्याना में मुस्लिम, जाटव, वाल्मीकि, गुर्जर, वैश्य, जाट, लोधी और ब्राह्मण समुदायों का खासा प्रभाव है, साथ ही पिछड़े वर्ग के वोटर भी बड़ी संख्या में हैं, जो चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते हैं। 2022 के चुनाव में भाजपा के देवेंद्र सिंह लोधी ने रालोद के दिलनवाज खान को भारी अंतर से हराया, जबकि रालोद को 23.49% और बसपा को 14.29% वोट मिले। 2017 में भी भाजपा ने सपा, बसपा और कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए बड़ी जीत हासिल की थी, जबकि 2012 में कांग्रेस ने आखिरी बार यह सीट जीती थी। हाल के रुझानों से स्पष्ट है कि स्याना सीट पर भाजपा का लगातार दबदबा बना हुआ है, कांग्रेस और बसपा का प्रभाव कमजोर हुआ है और रालोद ने मुस्लिम-जाट वोट बैंक को साधने की कोशिश की, लेकिन भाजपा के सामने खुद को टिकाए नहीं रख सकी।
विधायक परिचय और आपराधिक मामला
देवेंद्र सिंह लोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा में स्याना सीट से विधायक हैं। वे पेशे से वकील और किसान हैं तथा उन्होंने एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की है। राजनीतिक सफर की बात करें तो उन्होंने 2017 में पहली बार स्याना से चुनाव जीतकर विधायक के रूप में कदम रखा और 2022 में उन्होंने रालोद के दिलनवाज खान को 89,657 वोटों के बड़े अंतर से हराकर दोबारा जीत हासिल की। 2024 में उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा की सार्वजनिक उपक्रम एवं नियम समिति का सदस्य नियुक्त किया गया। वे स्व. बाबू कल्याण सिंह को अपना राजनीतिक आदर्श मानते हैं। 2022 में चुनाव आयोग को दिए गए शपथपत्र के अनुसार उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
स्याना विधानसभा: पिछले 5 वर्षों के प्रमुख मुद्दे
पिछले पांच वर्षों में स्याना विधानसभा क्षेत्र में कई प्रमुख मुद्दे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बने रहे। 2019 में गोकशी की घटना के बाद हुई हिंसा ने क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा दिया और पुलिस तथा प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े हुए, जो चुनावी बहस का अहम हिस्सा बन गया। क्षेत्र में बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण मतदाता होने के कारण सिंचाई, गन्ना भुगतान, फसल बीमा और कृषि लागत जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे, जिन पर किसान आंदोलन का भी असर पड़ा। जातीय समीकरणों की दृष्टि से मुस्लिम, दलित, जाट, ठाकुर, वैश्य, धामण और अन्य जातियों की अहम भूमिका रही, जिसने उम्मीदवारों के चयन और दलों की रणनीति को प्रभावित किया। बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर जनता में असंतोष बना रहा, जबकि शहरीकरण के साथ-साथ ग्रामीण विकास की मांग भी लगातार उठती रही। कानून-व्यवस्था की स्थिति, खासकर गोकशी, चोरी और राजनीतिक हिंसा की घटनाएं भी चुनावी मुद्दों में शामिल रहीं, जिन पर विपक्ष ने सत्तारुढ़ दल को घेरा। इसके अलावा, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर, स्वरोजगार योजनाओं की उपलब्धता और सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता की मांग भी महत्वपूर्ण चुनावी विषय बने रहे।

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